स्वास्थ्य मंत्री के नाम खुला पत्र

—–जवाब दे सरकार——

जब इंसान की बीमारियां एक समान हैं उनकी परेशानियां, लक्षण और तकलीफें एक जैसी हैं तो क्यों नहीं देश में आजादी के 64 वर्ष बाद भी स्वास्थ्य सुविधाएं एक समान नहीं की जा सकी हैं?

—–जागे जनता, मांग करे जनता—–

माननीय स्वास्थ्य मंत्री जी,

यह पत्र इस आशा और उम्मीद से लिख रही हूं, कि आपके द्वारा अवश्य ही कोई सार्थक, प्रभावी एवं ठोस कदम उठाया जाएगा। पत्र के माध्यम से मेरा निवेदन है कि आप मानसिक एवं हड्डी विकारों से ग्रस्त बच्चों के लिए बोटाक्स वैक्सीन थैरेपी को सामान्य टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करने की कृपा करें। यह वैक्सीन थैरेपी ऐसे बच्चों के लिए कारगर साबित हो सकेगी जो शारीरिक विकास में सामान्य बच्चों से पीछे रह गए हैं। इसे कुदरत की मार कहें या चिकित्सा विज्ञान की लापरवाही का नतीजा कि समाज में सेरेब्रल पाल्सी, आटिज्म और पोलियो मायलाइटिस की बीमारी के शिकार बच्चों की संख्या कम होने का नाम नहीं ले रही है। इनमें से सेरेब्रल पाल्सी के शिकार कई बच्चे ऐसे हैं जो समय पर उपचार मिलने पर अपने दैनिक जीवन के कार्य करने में सक्षम हो सकते है। लेकिन इसके लिए हम अभी स्पेशल स्कूलों पर निर्भर है और देश में स्पेशल स्कूलों की संख्या तो बढ़ रही है लेकिन ऐेसा स्पेशल अस्पताल एक भी नहीं है जहां बच्चे को सामान्य जिंदगी जीने के लायक बनाया जा सके। यदि हम फिलहाल स्पेशल अस्पताल में बनाने में कामयाब भले ही ना हो सकें लेकिन सामान्य अस्पतालों में ही बोटॉक्स वैक्सीन थैरेपी और फिजियोथैरेपी, आक्युपेशनल एवं स्पीच थैरेपी की व्यवस्था कर सकते हैं।

यह इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि हमारे देश में निःशक्त बच्चों के माता-पिता को यह पता ही होता कि उनका बच्चा अच्छा भी हो सकता है। या वे अपने बच्चे को कहां ले जाएं या वह कैसे ठीक हो सकता है? एलोपैथी, होम्योपैथी और आयुर्वेद डॉक्टरों के अपने दावे हैं। माता-पिता को जब कुछ नहीं सूझता तो वे चमत्कार की आस लगाये निःशक्त बच्चे को घर पर ही पड़ा रहने देते हैं। जबकि इनमें कई बच्चे ऐसे होते हैं जो उचित देखभाल और उपचार के ठीक हो सकते हैं। सेरेब्रल पाल्सी जैसे रोगों से जूझ रहे बच्चों को समय रहते ठीक किया जा सकता है। यदि इन्हें एक छत के नीचे पर्याप्त उपचार सुविधा जैसे बोटूलियम वैक्सीन, फिजियोथैरेपी, आक्युपेशनल थैरेपी, स्पीच एवं नैचुरोपैथी का लाभ मिल जाए तो कई बच्चों को पैरों पर खड़ा किया जा सकता है, परंतु अभी तक इस प्रकार की कोई भी व्यवस्था देश में नहीं है और यदि है भी तो ऐसे बच्चों के माता-पिता को इसकी जानकारी नहीं है। देखा गया है कि एलोपैथी, होम्योपैथी और आयुर्वेद पद्धति के डॉक्टर अपने-अपने हिसाब से इस रोग के इलाज की बातें करते हैं। लेकिन, सही मार्गदर्शन नहीं मिलने से इन बच्चों को सामान्य बच्चों की तरह जीवन जीने में काफी मुश्किलें आती है यही नहीं इन बच्चों के माता-पिता की ममता भी रोती है। इस संबंध में विदेशों में हो रहे शोध और अत्याधुनिक तकनीक का लाभ मिलने से भी ये बच्चे वंचित हैं। स्पेशल अस्पताल इस कमी को दूर करेंगे।

स्पेशल अस्पताल देश के सेरेब्रल पाल्सी, आटिज्म और मानसिक मंदता जैसे गंभीर व चुनौतीपूर्ण रोग से जूझ रहे बच्चों को सामान्य जिंदगी जीने लायक बनाने में सहायक होंगे। दूसरे राज्यों से ही नहीं, विदेशी अत्याधुनिक तकनीक और विशेषज्ञों के अनुभव का लाभ उठाने के लिए भी आगे आएंगे। ताकि निःशक्त बच्चों के चेहरे पर भी सशक्तता की मुस्कान बिखेरी जा सके।

स्पेशल अस्पताल होगा तो वहां बच्चों की देखभाल और उपचार की सभी व्यवस्था होगी। निःशक्त बच्चों में से ऐसे बच्चे चयनित किये जाएंगे जो अच्छे हो सकते हैं। फिर अलग-अलग चरण बनाकर उपचार लाभ प्रदान किया जाएगा। ऐसे बच्चे घर पर रहकर ठीक नहीं किये जा सकते लिहाजा इनके लिए स्पेशल अस्पताल में ही रहने के इंतजाम भी करना होंगे। अस्पताल में पौष्टिक नाश्ता, भोजन और दवाईयों को निर्धारित टाइम टेबिल के अनुसार दिया जाएगा। निःशक्त बच्चों की आयुर्वेद पद्धति से तैयार तेल से दो समय मालिश की जाएगी। होम्योपैथी दवाईयों के अलावा विदेशी तकनीक और फिजियोथैरेपी का लाभ भी दिया जाएगा। दैनिक कामकाज के तौर तरीकों का अभ्यास कराया जाएगा। पहले चरण की सफलता के बाद दूसरा चरण और फिर तीसरा चरण प्रारंभ करते हुए आगे बढ़ा जाएगा।

महोदय,

हमने पोलियो को नियंत्रित करने के लिए तो तमाम उपाय किये और काफी हद तक सफल भी रहे हैं लेकिन पोलियो से मिलते-जुलते कई तरह के रोगों की जकड़न से अभी नौनिहाल आजाद नहीं हो सकें है। इसके लिए लोगों विशेषकर गर्भवती महिलाओं में जागरूकता की कमी प्रमुख कारण है। समाज में भी निःशक्तों के प्रति उपेक्षा का वातावरण बना हुआ है। ऐसे बच्चों के माता-पिता तो परेशान हाल भटकते हैं और डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं। स्पेशल अस्पताल निःशक्त बच्चों को उपचार के साथ ही समाज में जागरूकता का वातावरण भी निर्मित करेगा। यही नहीं निःशक्त बच्चों के माता-पिता और परिवार के लिए मार्गदर्शन प्रदान करने का कार्य भी करेगा। ताकि निःशक्त बच्चों के प्रति सम्मान का माहौल बन सके। यही नहीं बच्चों को उनकी श्रेणी के अनुरूप इस योग्य बनाये जाने के प्रयास किये जाएंगे ताकि ऐसे बच्चे समाज के विकास में योगदान दे सकें और मुख्यधारा में जुड़कर योजनाओं का लाभ उठाकर आत्मनिर्भरता का जीवन यापन कर सकें।

मांसपेशी अपविकास और मस्तिष्क पक्षाघात से जूझ रहे बच्चों के अलावा ऐसे बच्चे जो समय पर चल-फिर नहीं पाते उनके लिए विशेष उपकरण भी अस्पताल परिसर में तैयार कराये जाएंगे। उन उपकरणों के उपयोग से बच्चों को शारीरिक अभ्यास कराया जा सकेगा ताकि बच्चे बड़े होकर अपने स्वयं के जरूरी काम अपने आप कर सकें। स्पेशल अस्पताल के शुरू होने से कई निःशक्त बच्चों के जीवन में नया सबेरा आ सकेगा वहीं कई बेरोजगारों को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। अंधविश्वास में भी आयेगी कमी। अभी निःशक्त बच्चों के उचित उपचार की ठोस व्यवस्था नहीं होने से लोग अंधविश्वास की चपेट में भी आ रहे हैं। अपने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कुछ चमत्कार की उम्मीद में अंधविश्वासी हो जाते है। तो कुछ इतने निराश की बच्चे का जीवन ही चैपट हो जाता है। यदि स्पेशल अस्पताल शुरू होगा तो न केवल समय रहते निःशक्त बच्चों को उचित इलाज मिल सकेगा बल्कि सही मार्गदर्शन मिलने से कई माता-पिता ठगी का शिकार होने से भी बच सकेंगे। इसके लिए बोटूलियम टाक्सिन थैरेपी की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।

बच्चों को कुपोषण से बचाने, संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देने और शिशु मृत्युदर को रोकने के लिए चलाई जा रही योजनाएं भी तभी सफल होंगी जब लोग जागरूक होंगे। ऐसे समय जब परिवार नियोजन को बढ़ावा दिया जा रहा है और लोग एक या दो बच्चों तक ही सीमित हो रहे हैं तब बच्चे स्वस्थ्य हों इसकी व्यवस्था करना भी जरूरी है। स्पेशल अस्पताल इसमें कारगर भूमिका निभा सकते हंै। बच्चे किसी भी देश और समाज की पहचान होते हैं। बच्चों के सशक्तिकरण पर देश का भविष्य निर्भर करता है। इसलिए बच्चों के उपचार की आधुनिक व्यवस्था होना बहुत जरूरी है। सेरेब्रल पाल्सी ऐसा रोग है जिसके बारे में लोग न तो जागरूक हैं न ही इलाज के पुख्ता इंतजाम हैं।

स्पेशल अस्पताल के लिए कम से कम चैबीस सौ स्क्वायर फिठ जगह की आवश्यकता होगी जहां दो मंजिला भवन में एक ही छत के नीचे क्लीनिक, एक रसोई कक्ष, दो मालिश व फिजियोथैरेपी हाॅल, एक अभ्यास एवं शयन के लिए हाल होगा। अस्पताल परिसर में ही जरूरी औषधीय एवं बागवानी के पौधे लगाये जाएंगे। स्पीच थैरेपी, पंचकर्म, गौ मूत्र व आयुर्वेद दवा निर्माण कक्ष बनाया जाएगा। एक परामर्श एवं मार्गदर्शन कक्ष, दो गेस्ट रूम, एक जांच केन्द्र और एक उपकरण निर्माण कक्ष बनाया जाएगा। तीन टायलेट एवं तीन स्नानागार बनाये जाएंगे। इसके लिए यह भी जरूरी है कि स्पेशल अस्पताल शहर के बीच में हो न कि शहर से बहुत अधिक दूर। स्पेशल अस्पताल तक आने जाने के लिए परिवहन सुविधा का होना बहुत आवश्यक है ताकि बाहर से आने वाले निःशक्त बच्चों को आने-जाने में परेशानी न हो।

समाज हो या सरकार, दुर्भाग्य यह है कि बात जब सिर से ऊपर गुजर जाती है तब हम जागते हैं। देश में जिस तरह से सेरेब्रल पाल्सी, आटिज्म और थैलेसीमिया जैसी खतरनाक बीमारी पैर पसार रही है। उसे देखकर चिंता और दुःख तो बहुत जताया जाता है लेकिन इनके प्रति न तो कोई जागरूकता है और न ही पर्याप्त संख्या में लोग आगे आ रहे हैं। यह भी तो एड्स और कैंसर की तरह घातक बीमारी हैं। लेकिन फिर भी न तो देश के नौनिहालों से जुड़ी इन बीमारियों के खिलाफ कोई अभियान छेड़ा गया है और न ही इन रोगों से निपटने के लिए ठोस इंतजाम हैं। स्पेशल अस्पताल की स्थापना से सेरेब्रल पाल्सी जैसी बीमारियों के खिलाफ भी जंग छेड़ी जा सकेगी और बच्चों को सशक्त बनाया जा सकता है।

स्पेशल स्कूल कम स्पेशल अस्पताल देशभर में खोले जाने से जहां नौनिहालों को सबल बनाने में सहायता मिल सकेगी वहीं बहुत से युवाओं में समाज सेवा का जज्बा जगाकर रोजगार-स्वरोजगार से जोड़ा जा सकेगा। स्पेशल अस्पताल प्रबंधन बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही उन्हें जनसहभागिता से स्पेशल ओलंपिक के लिए तैयार करने की भी कोशिश करेगा।

मस्तिष्क पक्षाघात से ग्रसित मरीजों की सही संख्या का अंदाज लगाना कठिन है फिर भी उपलब्ध सूचना के आधार पर यह पाया गया है कि प्रति हजार नवजात शिशु में से छह ऐसे बच्चे जन्म लेते हैं जो मस्तिष्क पक्षाघात से पीडि़त होते हैं। इससे इस बीमारी की भीषणता का पता चल जाता है। दिमागी पक्षाघात काफी आम विकलांगता है जो पोलियो के बाद दूसरे स्थान पर है। यह मस्तिष्क के चालक केन्द्र में खराबी के कारण होता है। इस बीमारी से पीडि़त बच्चों में आयु के अनुसार मानसिक विकास नहीं होता। फलस्वरूप इन्हें सामान्य जिंदगी जीने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। स्पेशल अस्पताल में जन्मजात विकृति के शिकार बच्चों को प्रशिक्षण और उपचार उपलब्ध कराया जाएगा। ताकि जीवन यापन आसान हो सके। मस्तिष्क पक्षाघात से ग्रसित बच्चों को मेडिकल टीम की आवश्यकता होती है। इन बच्चों को अत्यधिक मदद और फायदा पहुंचे इसके लिए निश्चित योजना के अनुसार स्पेशल अस्पताल काम करेगा। चूंकि ये कोई रोग न होकर एक अवस्था होती है जिसे बदला जा सकता है। इन बच्चों के लिए जरूरी है प्यार, समझदारी और प्रोत्साहन की। जो इनके जीवन में सुधार लाती है। पीडि़त बच्चे स्पेशल अस्पताल में रहकर जितनी जल्दी अच्छे हो सकते हैं उतने घर पर या अन्यत्र कहीं और नहीं। सीपी ग्रस्त बच्चे यदि इलाज विहीन रह गए तो बच्चों में रेंगने वाली विकृति बढ़ती चली जाएगी और वह सारी जिंदगी दूसरों पर ही निर्भर रह जाएगा।

टूटेगी भ्रान्ति:  जिस बच्चे का बौद्धिक स्तर (आई.क्यू.) कम होता है उस पर इलाज का कोई खास प्रभाव या इलाज के बाद सुधार नहीं पाया जाता है ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है। देखा गया है कि मस्तिष्क पक्षाघात के बच्चों का बौद्धिक स्तर 65 प्रतिशत से कम है और सही तरीके से उसका इलाज किया जाए तो उसमें आशा के विपरीत सफलता मिलती है। अतः यह सोचना गलत है कि कम आई क्यू वाले बच्चे को इलाज के बाद सफलता नहीं मिलती।

सीपी के मरीज अलग-अलग दोषों से ग्रसित होते हैं उनकी अलग-अलग समस्याओं को ध्यान में रखकर ही उपचार किया जाता है। मस्तिष्क पक्षाघात के चिन्ह व लक्षण अनेक होते हैं इन बच्चों में सुधार के परिणाम भी जल्द नहीं मिलते। इलाज के नए ढंग की खोज की गई है। नए-नए तरीकों की खोज जारी है। जरूरत है सीपी मरीजों के पुनर्वास, उपचार और प्रशिक्षण संबंधी विचारों में एकरूपता लाने की और इलाज की अत्याधुनिक तकनीकों का लाभ इन बच्चों को दिलाने की।

सीपी ग्रस्त बच्चों की खोज और इलाज के लिए एक राष्ट्रीय संस्था बनाने की जरूरत है जिसके माध्यम से सीपी बच्चों का पता लगाया जाए और उनके माता-पिता को उचित मार्गदर्शन देकर निःशक्त बच्चों को अपाहिज होने या रेंगने से बचाया जा सके। देश प्रदेश के कोने-कोने में इन बच्चों के लिए पुनर्वास परियोजना संचालित की जाना चाहिए ताकि कोई भी सीपी बच्चा अज्ञानता का शिकार बन कर उपेक्षित न रह जाए। सही और पूरा इलाज इन बच्चों का अधिकार है।

भावना श्रीवास्तव

भोपाल मप्र

इंडिया हल्ला बोल

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