उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव को लेकर अखिलेश और मायावती की प्रेस कॉन्फ्रेंस आज

आज पहली बार अखिलेश यादव और मायावती संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। इसमें लोकसभा चुनाव में गठबंधन की घोषणा होगी। दोनों दल 37-37 सीटों पर चुनाव लड़ सकते हैं। 26 साल बाद सपा-बसपा में गठबंधन हो रहा है। इससे पहले 1993 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा का गठबंधन हुआ था।

सपा-बसपा के गठबंधन में अगर कांग्रेस, रालोद भी शामिल होते हैं तो उत्तर प्रदेश में 60 लोकसभा सीटों पर भाजपा की राह मुश्किल हो सकती है। 37-37 सीटों पर सपा-बसपा के लड़ने की स्थिति में 6 सीटें सहयोगी दलों को दी जाएंगी।

 

कहा जा रहा है कि तीन सीटें रालोद और दो सीटें कांग्रेस को दी जा सकती हैं। एक सीट अन्य सहयोगी के लिए रखी जा सकती है। सीटों के बंटवारे में पेंच रालोद की वजह से फंस गया है। पार्टी प्रमुख अजीत सिंह चार सीटों चाहते हैं।

पिछले शुक्रवार को अखिलेश और मायावती के बीच दिल्ली में बैठक हुई थी। इसमें यह बात भी निकलकर आई थी कि दोनों कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने के पक्ष में नहीं हैं।मुलायम सिंह यादव ने 1992 में समाजवादी पार्टी का गठन किया था।

1993 में हुए विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा का गठबंधन हुआ। उस समय बसपा की कमान कांशीराम के पास थी। सपा 256 और बसपा 164 विधानभा सीटों पर चुनाव लड़ी। सपा को 109 और बसपा को 67 सीटें मिलीं। लेकिन 1995 में सपा-बसपा के रिश्ते खराब हो गए।

इसी समय 2 जून 1995 को गेस्ट हाउस कांड के बाद गठबंधन टूट गया। कहा जाता है कि 1993 में मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद बसपा और भाजपा के बीच नजदीकियां बढ़ने लगी थीं। सपा को इसका अंदेशा हो गया था कि बसपा कभी भी सरकार से समर्थन वापस ले सकती है।

2 जून 1995 को मायावती अपने विधायकों के साथ स्टेट गेस्ट हाउस में बैठक कर रही थीं। इसकी जानकारी जब सपा के लोगों को हुई तो उसके कई समर्थक वहां पहुंच गए। सपा समर्थकों ने वहां जमकर हंगामा किया। बसपा विधायकों से मारपीट तक की गई।

मायावती ने इस पूरे ड्रामे को अपनी हत्या की साजिश बताया और मुलायम सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। मुलायम सरकार के अल्पमत में आते ही भाजपा ने बसपा को समर्थन देने का पत्र राज्यपाल को सौंप दिया। अगले ही दिन मायावती राज्य की पहली दलित मुख्यमंत्री बन गईं।

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