लोकपाल को बिल में नहीं दिल में बसाएं

वर्ष २०११ बीत चुका है और नव वर्ष अपनी बाहें फ़ैलाये हमारा स्वागत कर रहा है। पर यह तो हर वर्ष की बात है। हम दिसम्बर के अंतिम सप्ताह से नये साल की तैयारी में लग जाते हैं। पर हर वर्ष तो एक सा ही होता है। समाज व देश वहीं का वहीं है। एक साल जाता है तो दूसरा आता है। पर इस बार कुछ अंतर है। पूरे विश्व में अलग हालात बन रहे हैं। क्या यह संकेत है एक अच्छे दौर के आने का? क्या यह संकेत है एक ऐसे विश्व का जिसमें समानता होगी, जिसमें सहमति व सद्भाव से हर देश काम करेगा।

आज पूरा विश्व कराह रहा है। अमरीका में विद्रोह है, यूरोपीय संघ टूट रहा है, मिस्र और लीबिया में क्रांति का दौर है। रूस में पुतिन के खिलाफ़ भी आवाज़ उठ रही है। और एक आँधी भारत में भी आई। उसका नाम रहा अन्ना। वर्ष का आरम्भ ही अन्ना और बाबा रामदेव ने अनशनों से शुरू हो गया। जहाँ अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद की तो वहीं बाबा रामदेव ने कालेधन को राष्ट्रीय सम्पत्ति घोषित करने के लिये आन्दोलन किया। हालाँकि वर्ष के अन्त तक इन दोनों ही मुद्दों का कोई परिणाम तो नहीं निकला पर इतना जरूर साफ़ हो गया कि आम जनता को इन मुद्दों का पता चल गया है। जनता जागृत हो रही है और यही इन आन्दोलनों की सफ़लता है। आध्यात्मिक गुरु इन आंदोलनों में सामने आ रहे हैं।

और आज जो सबसे बड़ा मुद्दा इस देश और इस विश्व के सामने है वो है स्वस्थ समाज का निर्माण। लोकपाल हमारी व्यवस्था में फ़ैले हुए भ्रष्टाचार को कम करने के लिये लाभकारी विधेयक साबित हो सकता है। पर केवल इस बिल से ही सब कुछ नहीं होगा। यह कानून रिश्वत देने व लेने पर सख्ती तो कर देगा पर आज नहीं तो कल इसका तोड़ भी निकल ही आयेगा। हमें चाहिये कि एक ऐसा समय आ जाये जब रिश्वत लेने व देने की बात सोची ही न जा सके। और यह कानून बनाने से नहीं आयेगा अपितु आत्मिक लोकपाल से आयेगा। हम ही होते हैं जो ट्रैफ़िक सिग्नल तोड़ते हैं और चालान की जगह पचास का नोट थमाते हैं। हम ही हैं जो ड्राईविंग लाईसेंस बनवाने के लिये  लाईन से बचना चाहते हैं और ३०० का लाईसेंस दो हजार में बनवाते हैं। हम ही होते हैं घर का नक्शा पास करवाने के लिये नगर निगम को पैसे देने वाले। और हम ही बिल्डर हैं जो किसी का घर बनाते हुए पानी ज्यादा मिलाता है। हम ही होते हैं वे दुकानदार जो मिलावट करते हैं। हम ही वे किराने वाले हैं और हम ही हलवाई। हम कोई नेता तो
नहीं। क्या यहाँ लोकपाल काम करेगा? जब हम ही रिश्वत देने वाले हैं तो लोकपाल के लिये आवाज़ क्यों उठा रहे हैं? कानून की नहीं स्वस्थ समाज की आवश्यकता है।

जिस तरह से हम नव वर्ष की खुशियाँ मनाते हैं, ठीक वैसे ही क्यों नहीं हम हर सूर्योदय पर जश्न मनाते? हर दिन खुशियाँ मनाते? ये खुशियाँ, ये हँसी, ये उत्साह, ये शुभकामनाओं का दौर बस उस एक दिन तक सीमित रह जाता है। एक जनवरी महज एक तारीख क्यों बन कर रह जाती है? क्या यहमहज एक औपचारिकता है?

क्या एक जनवरी भी बाज़ारवाद का शिकार है? ठीक उसी तरह जब प्रेम का, माँ का, पिता का, दोस्ती का एक एक दिन हमने चुन रखा है। उसी तर्ह 365 दिनों में से एक हमने शुभकामनाओं के लिये चुन किया? क्यों नहीं हर पल , हर दिन हम हर किसी के लिये दुआ माँगे। ईश्वर हमें नया वर्ष ही नहीं दे रहा बल्कि हर एक नया पल देता है, हर एक नया दिन देता है, हमें जीने के पल देता है फिर हम क्यों उस एक दिन के आने का मुँह ताकते हैं। ये युग हमारा है, हम चाहें तो इसे कलियुग बनायें या सतयुग। आने वाला युग बदलें। खुद को बदलें, समाज को बदलें, युग बदलें। हमें चाहिये कि हम एक इंसान बनकर ही दुनिया से विदा न हों, बल्कि एक इंसान बनकर अच्छे समाज से विदा लें। एक स्वच्छ एवं स्वस्थ समाज की कामना व प्रण लिये आप सभी को नव वर्ष की बधाई।

तपन शर्मा

(इंडिया हल्ला बोल)

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