हिन्दू धर्म – Hindu Dharma

मानते हैं, हैं इन सब में विश्वास : धर्म (वैश्विक क़ानून), कर्म (और उसके फल), पुनर्जन्म का सांसारिक चक्र, मोक्ष (सांसारिक बन्धनों से मुक्ति–जिसके कई रास्ते हो सकते हैं), और बेशक, ईश्वर । हिन्दू धर्म स्वर्ग और नरक को अस्थायी मानता है । हिन्दू धर्म के अनुसार संसार के सभी प्राणियों में आत्मा होती है । मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो इस लोक में पाप और पुण्य, दोनो कर्म भोग सकता है, और मोक्ष प्राप्त कर सकता है । हिन्दू धर्म में चार मुख्य साम्प्रदाय हैं : वैष्णव (जो विष्णु को परमेश्वर मानते हैं), शैव (जो शिव को परमेश्वर मानते हैं), शाक्त (जो देवी को परमशक्ति मानते हैं) और स्मार्त (जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं) । लेकिन ज्यादातर हिन्दू स्वयं को किसी भी सम्प्रदाय में नहीं वर्गीकृत करते हैं ।

ब्रह्म

हिन्दू धर्मग्रन्थ उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म ही परम तत्व है (इसे त्रिमूर्ति के देवता ब्रह्मा से भ्रमित न करें) । वो ही जगत का सार है, जगत की आत्मा है । वो विश्व का आधार है । उसी से विश्व की उत्पत्ति होती है और विश्व नष्ट होने पर उसी में विलीन हो जाता है । ब्रह्म एक, और सिर्फ़ एक ही है । वो विश्वातीत भी है और विश्व के परे भी । वही परम सत्य, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है । वो कालातीत, नित्य और शाश्वत है । वही परम ज्ञान है । ब्रह्म के दो रूप हैं : परब्रह्म और अपरब्रह्म । परब्रह्म असीम, अनन्त और रूप-शरीर विहीन है । वो सभी गुणों से भी परे है, पर उसमें अनन्त सत्य, अनत चित और अनन्त आनन्द है । ब्रह्म की पूजा नही की जाती है, क्योंकि वो पूजा से परे और अनिर्वचनीय है । उसका ध्यान किया जाता है । प्रणव ॐ (ओम्) ब्रह्मवाक्य है, जिसे सभी हिन्दू परम पवित्र शब्द मानते हैं । हिन्दु यह मानते है कि ओम की ध्वनि पूरे ब्रह्मान्द मे गून्ज रही है । ध्यान मे गहरे उतरने पर यह सुनाई देता है। ब्रह्म की परिकल्पना वेदान्त दर्शन का केन्द्रीय स्तम्भ है, और हिन्दू धर्म की विश्व को अनुपम देन है ।

ईश्वर
ब्रह्म और ईश्वर में क्या सम्बन्ध है, इसमें हिन्दू दर्शनों की सोच अलग अलग है । अद्वैत वेदान्त के अनुसार जब मानव ब्रह्म को अपने मन से जानने की कोशिश करता है, तब ब्रह्म ईश्वर हो जाता है, क्योंकि मानव माया नाम की एक जादुई शक्ति के वश मे रहता है । अर्थात जब माया के आइने में

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