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पहली बार गर्मजोशी से मिले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रैम्प और उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन

डोनाल्ड ट्रम्प और उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग-उन के बीच पहली बार यहां के कापेला होटल में मुलाकात हुई। दोनों नेताओं ने करीब 12 सेकंड तक हाथ मिलाया। इसके बाद इनके बीच करीब 50 मिनट तक बातचीत चली। ट्रम्प ने कहा कि किम के साथ मुलाकात बहुत अच्छी रही। हम दोनों के बीच बेहतर रिश्ते हैं।हम उत्तर कोरिया का ध्यान रखेंगे।

बता दें कि इसके लिए 6 महीने से कोशिशें हो रही थीं। बीच में कई बार ऐसा लगा कि दोनों नेता शायद ही आमने-सामने आएं। ट्रम्प ने एक बार मुलाकात रद्द भी कर दी थी, लेकिन किम ने उम्मीद नहीं छोड़ी। बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहॉवर (1953) से लेकर बराक ओबामा (2016) तक 11 अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने उत्तर कोरिया का मसला सुलझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी थी।

डोनाल्ड ट्रम्प और किम जोंग-उन ने अपनी पहली मुलाकात में करीब 12 सेकंड तक हाथ मिलाया। लेकिन जानकार इसे गर्मजोशी की मुलाकात नहीं मान रहे हैं। क्योंकि ट्रम्प किसी भी राष्ट्राध्यक्ष या अफसर से मिलते वक्त उनसे देर तक हाथ मिलाते हैं और सामने वाले का हाथ जोर से हिलाते हैं। हाल में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे से उन्होंने 19 सेकंड तक हाथ मिलाया था।

किम से मुलाकात में ऐसा उनकी बेहद गर्मजोशी भरा भाव नहीं दिखा। किम ही ट्रम्प का हाथ जोर से हिलाते दिखे।इस बैठक का मकसद परमाणु निरस्त्रीकरण है। यदि किम परमाणु निरस्त्रीकरण की तरफ बढ़े, तो यह ट्रम्प की जीत होगी। इसके बाद अमेरिका, उ. कोरिया के सामने निरस्त्रीकरण की शर्त रख कर उससे आर्थिक प्रतिबंध हटा सकता है।

अमेरिका द. कोरिया में मौजूद अपने 23 हजार सैनिकों को भी वापस बुला सकता है।बता दें कि उत्तर कोरिया ने पिछले दिनों अपने परमाणु कार्यक्रम को रद्द कर दिया और परीक्षण साइट तक खत्म कर दीं।ट्रम्प और किम के बीच करीब यह मुलाकात मंगलवार को सिंगापुर के सेंटोसा द्वीप के कापेला होटल में हुई।

इस मीटिंग के बाद ट्रम्प ने कहा कि किम के साथ मुलाकात बहुत अच्छी रही। हम दोनों के बीच बेहतर रिश्ते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि वे और किम मिलकर बड़ी समस्या को हल करेंगे। हम साथ मिलकर काम करेंगे। हम हर तरह से उत्तर कोरिया का ध्यान रखेंगे। मैं बातचीत को लेकर आश्वस्त हूं। हमें कामयाबी मिलेगी और हमारे रिश्ते भी शानदार रहेंगे।

इस बैठक के पहले ट्रम्प ने कहा थाा कि वे पहले मिनट में किम के हाव-भाव देखकर बता देंगे कि समिट कारगर होगी या नहीं।यह मीटिंग बंद दरवाजे में हुई। दोनों ने करीब 50 मिनट तक बातचीत की।इससे पहले, किम ने मीडिया से कहा कि यहां तक पहुंचना आसान नहीं रहा। पुरानी मान्यताओं ने रोड़ा अटकाने की कोशिश की। लेकिन हम इससे उबरे और आज यहां हैं। बता दें कि

व्हाइट हाउस के मुताबिक, मुलाकात के दौरान ट्रम्प के साथ उनकी कैबिनेट के दो सदस्य सेक्रटरी ऑफ स्टेट माइक पोम्पियो और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन रहे। हालांकि, उत्तर कोरिया की तरफ से किम के साथ कौन मीटिंग था। इस बारे में अभी तक किसी का नाम सामने नहीं आया है।

दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के बीच पन्मुंजोम गांव में डिमिलिट्राइज्ड जोन (असैन्य क्षेत्र) हैं। पहले यहीं दोनों नेताओं के बीच मिलने की खबर थी, लेकिन अमेरिकी अफसर सुरक्षा कारणों से राजी नहीं हुए। तब ऐसी जगह पर विचार किया गया जो दोनों देशों के लिए भरोसेमंद रहे। तब सिंगापुर का नाम आया। इसकी वजह यह कि इस देश के अमेरिका और उत्तर कोरिया से बेहतर रिश्ते हैं। 

सिंगापुर में उत्तर कोरिया का दूतावास भी है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच अच्छे कारोबारी संबंध भी हैं। यहां विरोध-प्रदर्शन की भी मनाही है।ट्रम्प के सत्ता में आए तो तब अमेरिका और उत्तर कोरिया के रिश्ते काफी बिगड़े हुए थे। उत्तर कोरिया लगातार परमाणु परीक्षण कर रहा था। जंग तक की नौबत आ गई थी। जनवरी 2018 में नई शुरुआत हुई।

उत्तर कोरिया ने शांति की पहल की। मार्च में दक्षिण कोरिया ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और एक अन्य अफसर को उत्तर कोरिया भेजा। बाद में दोनों अफसर उत्तर कोरिया की ट्रम्प से बातचीत की पेशकश लेकर अमेरिका गए। ट्रम्प राजी भी हो गए। लेकिन, बीच में तल्खी आ गई। तब दुनिया को लगा कि अब बात नहीं बनने वाली।

लेकिन 1 जून को व्हाइट हाउस ने फिर से दोनों नेताओं के बीच होने वाली बैठक की पुष्टि कर दी।माना जा रहा है कि किम ने परमाणु कार्यक्रम बंद करने का फैसला सोच समझकर लिया है। ताकि उत्तर कोरिया से प्रतिबंध हट सकें और वहां की इकोनॉमी बेहतर हो सके।उत्तर कोरिया में रूस-चीन का तो दक्षिण कोरिया के साथ जापान और अमेरिका हैं।

बातचीत कामयाब नहीं हुई तो दो धड़ों में बंटे इन देशों के बीच खाई और गहरी हो सकती है।जापान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका का गुआम बेस उत्तर कोरिया की मिसाइलों की जद में आता है। साथ ही उसके पास परमाणु ताकत भी है। इन दोनों देशों पर कोई भी हमला अमेरिका को जवाबी कार्रवाई करने के लिए भड़का सकता है। जिससे दोनों ही तरफ जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है।

उत्तर कोरिया की तरफ से इस खतरे को कम करने के लिए भी ये बातचीत बेहद अहम है।उत्तर कोरिया के साथ विवाद को खत्म करने के लिए अमेरिका 65 साल से कोशिश कर रहा है। इस दौरान अमेरिका के 11 राष्ट्रपति ( आइजनहॉवर से लेकर जॉन एफ केनेडी, लिंडन जॉनसन, रिचर्ड निक्सन, गेराल्ड फोर्ड, जिमी कार्टर, रोनाल्ड रीगन, जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश, बिल क्लिंटन, जॉर्ज डब्ल्यू बुश और बराक ओबामा) उत्तर कोरिया के साथ कोई हल निकालने में नाकाम रहे।

दरअसल, 1953 में दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया की जंग खत्म हुई थी। यह जंग 3 साल चली थी। इसके बाद दे उत्तर कोरिया और अमेरिका में बातचीत बंद है। इसमें 25 लाख लोग मारे गए थे। जिनमें 9 लाख सैनिक थे।1954 में जेनेवा कॉन्फ्रेंस में रूस (तब सोवियत संघ), चीन, अमेरिका, यूके और फ्रांस कोरिया की समस्या का हल निकालने के लिए इकट्ठा हुए।

उस वक्त अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहॉवर थे। मीटिंग में अमेरिकी विदेश मंत्री रहे जॉन फॉस्टर डलेस का अड़ियल रुख रहा। उन्होंने चीन के साथ सीधे बात करने से मना कर दिया। जिसके चलते कोई नतीजा नहीं निकल पाया। इसके बाद फिर हर दशक में कोशिशें होती रहीं।

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