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वास्‍तु दोष के कारण और निवारण के उपाय

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अपने आस पास की भूमि के दोषों, वातावरण के साथ सामंजस्य की कमी, मकान की बनावट के दोषों, घरेलू उपकरणों को गलत जगह रखे होने आदि से उत्पन्न होते हैं। हमारा शरीर और समस्त ब्रह्माण्ड पंच महाभूतों से मिल कर बना है। महाभूतों , दिशाओं, प्राकृतिक ऊर्जाओं के तारतम्य से भवन का निर्माण होने पर जीवन में शुभता आती है और जीवन में सभी प्रकार से सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। पंचभूतों के सही समायोजन के अनुसार, दिशाओं के वास्तुनियमों के अनुसार भवन का निर्माण हमारे जीवन को, हमारे विचारों की दिशा, हमारी जीवन पद्धति और स्वास्थ्य आदि सभी भावों को पूर्णतया प्रभावित करते हैं। हम आपको बता रहे हैं वास्‍तु दोष के मुख्‍य कारण और उसके उपाय। पढ़ें और जानें…

मकान कैसी भूमि पर स्थित है ?
मकान जिस भूमि पर स्थित है, उसका आकार क्या है ?
भवन में कमरों, खिड़कियों, स्तम्भों, जल निकास व्यवस्था, मल के निकास की व्यवस्था, प्रवेश द्वार, मुख्य द्वार आदि का संयोजन किस प्रकार का है ?
भवन में प्रकाश, वायु और विद्युत चुम्कीय तरंगों के प्रवेश और निकास की क्या व्यवस्था है ?
भवन के चारों ओर अन्य इमारतें किस प्रकार बनी हुई हैं ?
भवन के किस हिस्से में परिवार का कौन सा व्यक्ति रहता है ?
भवन में किस दिशा में निर्माण सबसे भारी और किस दिशा में हल्का है ?
भवन की कौनसी दिशा ऊँची है और कौनसी नीची ?
भवन में किस दिशा में खुला स्थान है ?

इस प्रकार की सभी बातें घर के वास्तु को प्रभावित करती हैं। वास्तुशास्त्र में इन सब बातों के लिए नियम बनाए गए हैं, इनमें रहे दोष ही वास्तु दोष कहलाते हैं। भवन निर्माण में रहे वास्तु दोष जीवन में गंभीर दुष्परिणाम देते हैं।

इस प्रकार भवन से जुड़ी हर गतिविधि का प्रभाव भवन में रहने वाले व्यक्ति के जीवन पर पड़ता है। इन्हीं सब व्यवस्थाओं पर जीवन निर्भर होने के कारण जीवन का हर पहलू वास्तु संबंधी कारणों से जुड़ा होता है। जीवन का हर पहलू इनसे कभी अछूता नहीं रह पाता।

भवन के निर्माण और उपयोग में रहे दोषों को ही वास्तुदोष कहा जाता है। भवन के निर्माण से पहले वास्तु पुरुष की पूजा आवयश्क रूप से की जाती है, ताकि भवन के निर्माण में रही खामियों से भवन और भवन में रहने वाले लागों के जीवन को वास्तु दोष के प्रभावों से मुक्त रखा जा सके।

वास्तु दोष के कारण होने वाले दुष्प्रभाव

आर्थिक समस्याएं आर्थिक उन्नति न होना, धन का कहीं उलझ जाना, लाभों का देरी से मिलना, आय से अधिक व्यय होना, आवश्यकता होने पर धन की व्यवस्था ना हो पाना, धन का चोरी हो जाना आदि।

पारिवारिक समस्याएं वैवाहिक संबंधों में विवाद, अलगाव, विवाह में विलम्ब, पारिवारिक शत्रुता हो जाना, पड़ोसियों से संबंध बिगड़ना, पारिवारिक सदस्यों से किसी भी कारण अलगाव, विश्वासघात आदि।

संतान संबंधी चिन्ताएं संतान का न होना, देरी से होना, पुत्र या स्त्री संतान का न होना, संतान का गलत मार्ग पर चले जाना, संतान का गलत व्यवहार, संतान की शिक्षा व्यवस्था में कमियां रहना आदि।

व्यावसायिक समस्याएं कैरियर के सही अवसर नहीं मिल पाना, मिले अवसरों का सही उपयोग नहीं कर पाना, व्यवसाय में लाभों का कम होना, साझेदारों से विवाद, व्यावसायिक प्रतिद्वन्द्विता में पिछड़ना, नौकरी आदि में उन्नति व प्रोमोशन नहीं होना, हस्तान्तरण सही जगह नहीं होना, सरकारी विभागों में काम अटकना, महत्वाकांक्षाओं का पूरा नहीं हो पाना आदि।

स्वास्थ्य समस्याएं भवन के मालिक और परिवार जनों की दुर्घटनाएं, गंभीर रोग, व्यसन होना, आपरेशन होना, मृत्यु आदि।कानूनी विवाद, दुर्घटनाएं, आग, जल, वायु प्रकोप आदि से भय, राज्य दण्ड, सम्मान की हानि आदि भयंकर परिणाम देखने को मिलते हैं।

वास्तुदोषों के निराकरण के लिए करते हैं वास्तु संबंधी उपकरणों की स्थापना

वास्तु संबंधी दोषों के उपचार दोषों की प्रकृति पर और उससे होने वाले परिणामों की गंभीरता पर निर्भर होते हैं। हल्के वास्तु दोषों का उपचार कम प्रयासों से संभव हो जाता है, जबकि कई बार कमियां इतनी बड़ी हो जाती हैं कि उनके दुष्प्रभावों से मुक्ति के लिए बड़े बदलावों की आवश्यकता पड़ती है। वास्तु संबंधी उपचार कई प्रकार से किए जाते हैं। ये उपचार शास्त्रोक्त पद्धतियों के साथ साथ बदलते हुए परिवेश में विशेषज्ञ के अनुभवों पर भी निर्भर करते हैं।

वास्तु दोषों को शान्त करने के लिए संभवतया पहला प्रयास निर्माण संबंधी बड़ी खामियों को दूर करना होता है। इसमें भवन में आमूल चूल परिवर्तन करके दिशाओं के अनुरूप पुनः निर्माण करवाया जाता है। लेकिन ऐसा कर पाना कई बार संभव नहीं हो पाता है।

भवन की किस दिशा में किस व्यक्ति को रहना चाहिए, इसके अनुसार भवन के उपयोग में बदलाव लाकर भी वास्तु संबंधी कमियों को दूर किया जाता है। जैसे भवन के दक्षिण पश्चिम में घर के मालिक को रहना चाहिए, विवाहयोग्य संतान को उत्तर पश्चिम दिशा में।भवन में काम में लिए जाने वाले घरेलू संसाधनों जैसे टी वी, सोफा, डाइनिंग टेबल, बेड, अलमारी आदि की दिशा बदलकर भी वास्तु संबंधी समस्याओं को दूर किया जा सकता है।

मुख्य द्वार का स्थान बदलकर भी वास्तु दोषों का निवारण किया जा सकता है।घर में उपयुक्त पालतू पशु या पक्षी रखकर भी वास्तु दोषों से मुक्ति पायी जाती है।उपयुक्त व शुभ वृक्षों और पौधों के सही दिशा में संयोजन से भी वास्तु दोषों के दुष्परिणाम कम होते हैं।जल संग्रह की दिशा बदलने से वास्तु दोषों के दुष्परिणामों में बड़ी सफलता मिलती है।भूमि की आकृतियों को सुधार कर वास्तु के बड़े दुष्परिणामों से मुक्ति मिलती है।

पूजन, हवन व यज्ञ आदि कर्मों द्वारा भवन में शुभता व सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने से भी वास्तु संबंधी दोषों के दुष्प्रभावों से मुक्ति मिलती है। ऐसी स्थिति में जब घर के निर्माण संबंधी या अन्य बदलावों से यथेच्छ परिणाम मिलने की स्थिति ना बन पाए तब वास्तु संबंधी उपकरणों की उपयुक्त दिशा में स्थापना करके वास्तु दोषों का निराकरण किया जाता है।जल से भरे पात्रों , झरनों व चित्रों आदि की स्थापना।

वास्तुयंत्र की स्थापना

विभिन्न यंत्रों की स्थापना ( वास्तु दोषों के अनुरूप श्रीयंत्र, कुबेर यंत्रादि )
विभिन्न देवों की मूर्तियों व चित्रों की स्थापना
गणपति की मूर्तियों व चित्रों आदि की स्थापना ( वास्तु दोषों के अनुरूप विघ्न विनायक, सिद्धि दायक आदि विभिन्न मुद्राओं में )
श्री लक्ष्मी की मूर्ति व चित्रों की स्थापना ( वास्तु दोषों के अनुरूप विभिन्न मुद्राओं में )
श्री बालगोपाल की मूर्ति व चित्रों की स्थापना
श्री दुर्गा व नवदुर्गा की मूर्ति व चित्रों की स्थापना
श्री हनुमान की मूर्ति व चित्रों की स्थापना
श्री कृष्ण की मूर्ति व चित्रों की स्थापना
श्री सरस्वति की मूर्ति व चित्रों की स्थापना
श्री राम दरबार की मूर्ति व चित्रों की स्थापना
श्री शिव की मूर्ति व चित्रों की स्थापना
श्री शिव परिवार की मूर्ति व चित्रों की स्थापना
श्री लक्ष्मी गणेश की मूर्ति व चित्रों की स्थापना
श्री लक्ष्मीनारायण की मूर्ति व चित्रों की स्थापना
पारिवारिक सदस्यों के सुखद चित्रों की स्थापना
सांकेतिक चित्रों की स्थापना
दिशाओं के अनुरूप रंगों का प्रयोग करके
गाय और बछड़े की शुभ आकृतियों की स्थापना
शुभ वृक्षों और पौधों की स्थापना

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