Oops! It appears that you have disabled your Javascript. In order for you to see this page as it is meant to appear, we ask that you please re-enable your Javascript!

Surprising Secrets for Coping With Childlessness । नि:संतान दंपती प्राप्त कर सकते हैं संतान जानें कैसे

DREAM-HEALTHY-BABY

जन्म कुंडली से गर्भाधान काल के योग (एक विश्लेषण) जन्म कुंडली में त्रिकोण भावों को सबसे शक्तिशाली माना जाता है। लग्न व्यक्तित्व व व्यक्ति के स्वास्थ्य का भाव है। पंचम भाव बुद्धि, संतान तथा निर्णय क्षमता से संबंध रखता है। नवम भाव भाग्य का है। यह धर्म व चिंतन का भाव भी है। इन्हीं तीनों भावों को ‘त्रिकोण’ कहा जाता है।

तंत्र-साहित्य में ‘त्रिकोण’ निर्माण तथा सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है। पंचम भाव संतान का है तथा इसका कारक बृहस्पति है। जातक के जीवन में संतान तथा भाग्य से इस भाव का गहरा संबंध है। बृहस्पति इसका कारक इसलिए है क्योंकि उसकी यहां उपस्थिति अपनी स्थिति व दृष्टि से त्रिकोण पर पूर्ण प्रभाव रखती है।

फलित-ज्योतिष का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है ‘भावात् भावम्’। अर्थात् भाव से भाव तक। जिस भाव पर विचार करना है, उसे लग्नवत मानकर विभिन्न भावों पर विचार। पंचम भाव से पंचम अर्थात् नवम भाव भी संतान विचार में महत्वपूर्ण है। यों तो संतान योग जातक की जन्मकुंडली में जैसा भी विद्यमान हो उस अनुसार प्राप्त हो ही जाता है, फ़िर भी कुछ प्रयासों से मनचाही संतान प्राप्त की जा सकती है।

यानी प्रयत्न पूर्वककर्म करने से बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है।विवाहोपरांत दंपती को संतान प्राप्ति की प्रबल उत्कंठा होती है। आज जब लड़कियां भी पढ़-लिखकर काफ़ी उन्नति कर रही हैं तो भी अधिकांश दंपती की दबे छुपे मन में पुत्र संतान ही प्राप्त करने की इच्‍छा रखते हैं।

भारतीय धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि बिना पुत्र सन्तान के मुक्ति असम्भव है। जीवन का महत्त्वपूर्ण सुख सन्तान सुख है। पितृ ऋण चुकाने हेतु भी सन्तान उत्पत्ति आवश्यक है। किसी जातक को सन्तान सुख प्राप्त होगा या नहीं, इसके लिए ज्योतिष एक आधार प्रस्तुत करता है।

स्त्रियों के मासिक धर्म प्रारम्भ से 16 रात्रि तक ऋतुकाल कहा गया है। इसकी प्रारंभिक चार रात्रि गर्भाधान के लिए त्याज्य मानी गई हैं। इसके बाद की 12 रात्रियां गर्भधारण करने के लिए उपयुक्त मानी गई हैं। यदि स्त्री एवं पुरुष का संगम सम रात्रियों 6, 8, 10, 12, 14, 16 में हो तो ये पुत्र सुख देने वाली हैं तो विषम रात्रियां 5, 7, 9, 11, 13, 15 में स्त्री एवं पुरुष का संगम हो तो कन्या सन्तान की उत्पत्ति होती है।

गर्भाधान के लिए क्या आवश्यक गर्भाधान के लिए पंचम भाव एवं पंचमेश की शक्ति की परख या परीक्षण आवश्यक है। इसी शक्ति के आधार पर प्रजनन क्षमता का पता लगाया जाता है। पुरुष की कुण्डली के पंचम भाव से बीज एवं स्त्री की कुण्डली के पंचम भाव से क्षेत्र की क्षमता बताई जाती है। जब बीज और क्षेत्र दोनों का कमजोर सम्बन्ध बने तो सन्तान सुख की प्राप्ति कमजोर ही रहती है। इस स्थिति में अनुकूल ग्रह स्थितियां ही गर्भाधान कराती हैं।

मंगल एवं चन्द्र के कारण स्त्रियों को रजोधर्म रहता है। यदि स्त्री की जन्म राशि से चन्द्रमा अनुपचय स्थानों से गोचर करे एवं उस चन्द्र पर मंगल की दृष्टि हो, तो स्त्री गर्भ धारण करने में सक्षम होती है।इसी प्रकार पुरुष की जन्म राशि से चन्द्र उपचय स्थानों से गोचर करे एवं उस पर बृहस्पति एवं शुक्र की दृष्टि हो तो गर्भधारण हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि पुरुष एवं स्त्री की जन्मकुण्डली से उपरोक्त ग्रह स्थितियां गोचरवश बन रही हों।

पंचमेश एवं पंचम भाव शुभ ग्रहों से युत या दृष्ट हो तो संभावना अधिक हो जाती है। ग्रहों में चन्द्र को जल एवं मंगल को रक्त व अग्नि का कारक माना जाता है। चन्द्र रक्त में श्वेत रुधिर कणिकाओं एवं मंगल लालरुधिर कणिकाओं का नेतृत्व करता है। जब चन्द्र एवं मंगल की परस्पर दृष्टि बने या सम्बन्ध बने तब रजोधर्महोता है।

रजोधर्म काल में यदि उपरोक्त स्थितियां बन रही हों तो लेकिन पुरुष से संगम न हो, स्त्री अधिक आयु या कम आयु की हो, किसी रोग से ग्रस्त हो या बांझ हो तो उसे गर्भधारण नहीं होता है।पुरुषों की कुण्डली में इसी प्रकार से चन्द्र, शुक्र एवं प्रजनन कारक सूर्य का विषम राशि में बलवान होकर स्थित होना XY गुणसूत्र को बली बनाता है। यदि बीज एवं क्षेत्राकारक बली हो एवं किसी प्रकार का दोष न हो व गर्भाधान के लिए उपयुक्त ग्रह स्थितियां गोचरवश बन रही हों तो गर्भाधान हो जाता है।

Check Also

हथेली में रेखाओं के किन योगों से हो सकता है कौन सा रोग

हथेली की रेखाओं से यह भी मालूम किया जा सकता है कि भविष्य में किसी …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *