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महिला दिवस पर कितनो का म-हिला

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वर्ष 1907 में अंतर्राष्ट्रीय जर्मन महिला कर्मी यूनियन ने समान कार्य समान वेतन और काम के घंटे , आदि को लेकर हड़ताल की ये दुनिया में महिलाओ की पहली हड़ताल थी इस लिए अगले वर्ष 1908 में 28 फ़रवरी को न्यू यॉर्क में इस हड़ताल की याद में महिला दिवस  मनाया गया पर हमारे देश की तरह विदेश में नहीं होता कि जब जो चाओ काम कर लो ये देखो ही ना कि दुसरे उसको पसंद कर रहे है या नहीं।

अमेरिकन महिलाये अपने वोट देने के अधिकार और नौकरी में रंग भेद को लेकर राष्ट्रीय अमेरिकन महिला दिवस मनाने लगे पहले ये तय हुआ कि फ़रवरी के अंतिम रविवार को महिला दिवस मनाया जायेगा पर लंदन की महिला ने अपने वोट देने के अधिकार के लिए ट्रैफ़लर स्क्वायर पर 8 मार्च 1914  को प्रदर्शन किया जिसमे गिरफ्तारियां भी हुई और उस दिन इतवार था तो बस शुरू हो गया महिला दिवस 8 मार्च को मनाने का फैशन। जर्मन महिलाओ को वोट देने का अधिकार 1918 में जाकर मिला। पर भारत में महिला को लेकर ऐसी समस्या कभी नहीं रही।

इसलिए हम महिला दिवस क्या मना रहे है क्योकि हमारे देश में महिला पुरुष के बराबर तो हमेशा से रही बल्कि वो देवी लक्ष्मी भी बन कर विराजी लेकिन यथार्थ में लड़की को शरीर के इर्द गिर्द ही रक्खा गया और इसी लिए भारत की महिला ने जिस आजादी और स्वतंत्रता की वकालत की वो यूरोपियन और अमेरिकन से बिलकुल अलग थी। अगर 12 वी से 16 वि शताब्दी के बीच औरत डायन कह कर यूरोपियन देशो में ज्यादा मारी जा रही थी तो भारत में सती कह कर उसको जिन्दा जलाया जा रहा था।

दहेज़ के लिए उसको मारा जा रहा था। विधवा को विवाह करने का अधिकार नहीं था, बाल विवाह उनके जीवन में था क्योकि मासिक शुरू होने से पहले शादी ना होने पर पिता को ब्रह्म हत्या लगती थी, पर 1948 के बाद पूरे विश्व में महिला के लिए घरेलू हिंसा सबसे बड़ी परेशानी बन गयी।एक जानवर के समाज में मादा ज्यादा स्वतंत्र थी क्योकि अपने गुणों का परिचय देकर ही एक नर जानवर किसी मादा के साथ समबन्ध बना सकता था/है। लेकिन मानव समाज में औरत मानव संसाधन बन गयी उसका शरीर पहले गुलाम के रूप में बेचकर पैसा खरीदने का साधन था तो बाद में जिस्मफरोशी से विश्व का सबसे बड़ा आर्थिक व्यापार खड़ा कर दिया गया।

इन सब में एक भावना जो पुरुष में घर करती गयी वो थी पैसा और उनको लगा कि औरत और पैसा एक दूसरे के पर्याय है जिसने महिलाओ के गरिमा को समाज में थोड़ा स्तरहीन किया और मध्यकालीन समाज में तो महिला को सिर्फ पैरों पर खड़ा जिन्दा मांस समझा जाने लगा जिसके कारण औरत सिर्फ शारीरिक आनंद का प्रतिबिम्ब बन गयी अपने को बचाने और घरों की अस्मिता के लिए एक विकल्प यही था कि लड़की घर से बाहर ही ना जाये तो औरत घरों में रह गयी और ये वो दौर था जब घर में रहने के कारण वो शिक्षा और ज्ञान से दूर हो गयी उसका काम सिर्फ घर के लोगो की सेवा और खाना बनाना हो गया जिसके कारण मनुष्य से कही आगे ( अपाला , घोषा , गार्गी आदि ) होने के बाद भी महिला घर में कैद हो गयी।

महिला को इज्जत का पर्याय बना दिया गया क्योकि तत्कालीन समाज में ऐसे प्रबह्वी उपचार नहीं थे जिनसे अनचाहे गर्भ को समाप्त किया जा सकता और इस परेशानी से बचने के लिए औरत को ज्यादा से ज्यादा कठोरता में रखा गया।इस लिए जब भारत में महिला दिवस मनाने की बात की जाए तो उसमे औरत की वो आजादी गरिमा ज्यादा है जो उसको घरों में कैद होने के कारण खोती सी नज़र आई | इस लिए भारत का महिला दिवस बिलकुल भिन्न है आज भी इस देश में एक लड़की के साथ यदि ज्यादा दिखाई दे जाये तो भाई बहनो के देश में कोई भी उनके बीच पवित्र रिश्ते को स्वीकार नहीं करता। आज भी इस देश में लड़की को पुरुष मारता है पीटता है और स्वतंत्र है।

आज भी पुरुष को लगता है कि लड़की की प्रगति में उसकी योग्यता से ज्यादा उसका शरीर है। आज भी एक पीड़ित लड़की से ज्यादा लड़की के गरिमा से खेलने वाले की सामाजिक प्रस्थिति को महत्व दिया जाता है। आज भी इस देश में लड़की सेक्स की बात करने पर बदनाम हो जाती है आत्महत्या कर लेती है। आज भी लड़की अपना शोषण करवा कर पुलिस और न्यायलय के सामने कह देती है कि उसके साथ कुछ नहीं हुआ है क्योकि उसको अपना और अपने घर का भविष्य दिखाई देता है।

अभी भी लड़की की फोटो के नाम पर ना जाने कितने जुल्म उसके साथ होते रहते है। अभी भी देश में सभी महिलाओ को समान रूप से मातृत्व लाभ नहीं मिलता है किसी को 15 दिन तो किसी को 180 दिन की छुट्टी  मिलती है।अभी भी महिला को ऑफिस में रिसेप्शनिस्ट की ही नौकरी दिए जाने के योग्य माना जाता है।अभी भी किसी लड़की को इस देश में भरोसा नहीं रहता कि वो अपनी गरिमा के साथ घर वापस शाम को पहुंचेगी।अभी भी घरों में भाई पति को खाना और पानी देने का रिवाज जारी है पर पुरुष बहन और पत्नी को खाना और पानी दे ये स्तरहीन काम माना जाता है।

क्या कभी आपको इस देश में महिला दिवस में इन सभी बातों की गूंज सुनाई दी या फिर जिसे देखिये बाज़ारू तरीके से महिला दिवस मना कर अपने को महिला का मसीहा बताने में जुटा है कुछ लोगो ने एक भाषण तैयार कर रखा है जो वो हर साल बोलते है। कुछ लोग महिला दिवस का आयोजन इस लिए कर रहे है ताकि उनको सरकार से पुरस्कार और अनुदान मिल सके। ऐसे पुरुष महिला दिवस मना रहे है जो महिला के शासन पर चुप रहते है ताकि उनकी नौकरी बची रहे भले ही देश की कई लडकिया अपनी अस्मिता को बिकता देखती रहे।

क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि हम आज ता महिला के वर्चस्व को मान नहीं पाये क्योकि सारे जानवरों में मादा ही का वर्चस्व पुरुष चयन में होता है पर हम तो जानवर है, नहीं! हम तो मनुष्य है! हमने संस्कृति बनाई है! कुछ तो जानवरों से लगा होना चाहिए क्या हुआ गर वो महिला का शोषण है काम से कम हम सांस्कृतिक तो कहलाते है।  ………..क्या आपका म ………………हिला (अरे ज्यादा दिमाग ना लड़ाईये म का मतलब मन होता है आपका मन हिला या नहीं )

आप सभी को महिला दिवस की शुभकामना अपनी बहन और पत्नी माँ को भी आप एक बार खाना , पानी देकर देखिये शायद एक बार तो महिला दिवस को दिल से समझ पाएंगे। क्या करेंगे ऐसा!

डॉ आलोक चान्टिया

इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। ये जरूरी नहीं कि इंडिया हल्लाबोल.कॉम  उनसे सहमत हो। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। 

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