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ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों..?

उत्तराखंड में कुदरत के इस कहर से हर कोई हैरान है…शासन-प्रशासन बेबस है…हर किसी के जुबान पर यही सवाल है कि आखिर ये तबाही क्यों..? तबाही का ये मंजर दर्दनाक और दिल को दहला देने वाला जरुर है लेकिन आज नहीं तो कल ये होना ही था..! कुदरत अपना हिसाब खुद बराबर करती है…उसे न तो जेसीबी मशीन की जरुरत है न ही किसी विस्फोटक की..! उसने तो एक झटके में सब तहस नहस कर दिया..!

आसमान से बादलों की गर्जना शुरु हुई तो जीवनदायनि ने रौद्र रुप धारण कर लिया…पहाड़ों का सीना दरकने लगा और जीवन देने वाली मौत देने पर अमादा हो गयी..! रास्ते में जो मिला सब बहा कर ले गयी…क्या घर, क्या सड़कें, क्या पुल, क्या गाड़ियां, क्या पेड़, क्या इंसान, क्या जानवर! भागीरथी मानो सब कुछ बहा ले जाना चाहती थी..!

चारों तरफ हाहाकार मचा था…हर कोई ये जानना चाहता था कि आखिर कुदरत क्यों इतना रूठ गयी है कि सब कुछ तबाह कर देना चाहती है..! इसका जवाब को लेकर एक बड़ी बहस शुरु हो सकती है लेकिन इसका जवाब तबाही के इस मंजर में ही छिपा हुआ है। याद कीजिए उत्तराखंड राज्य निर्माण से पहले का वो समय जब गंगा अविरल बहती थी…उसे अतिक्रमण की दीवारों में कैद करके नहीं रखा गया था..! 200-200 फिट चौड़ी गंगा को 20-20 फिट की नहरों मे तब्दील नहीं किया गया था। गंगा अपने तट पर बसने वाले करोड़ों लोगों को जीवन देते हुए बिना रुके बहती थी..!

इंसान हो, वनस्पतियां हों या फिर जानवर गंगा सबके लिए जीवनदायिनि थी लेकिन बीते कुछ सालों में गंगा का स्वरुप बदलता चला गया। गंगा को कभी बांधों ने बांधा तो कभी गंगा किनारे अवैध अतिक्रमण के नाम पर बने होटल, रेस्टोरेंट और अवैध बस्तियों ने गंगा की पहचान को ही खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी..! अतिक्रमण से भी मन नहीं भरा तो होटल, रेस्टोरेंट और अवैध बस्तियों का मल मूत्र भी गंगा में ही डाला जाने लगा..! गंगा धीरे-धीरे एक गंदे नाले में तब्दील होने लगी..!

निर्मल पावन गंगा की जगह भ्रष्टाचार की मैली गंगा बहने लगी और हर कोई भ्रष्टाचार की इस गंगा में डुबकी लगाकर अपने ऐशो आराम की हर वस्तु पा लेना चाहता था..!

गंगा घुट- घुट कर बहने पर मजबूर होने लगी तो पेड़ों की अवैध कटाई से हरे भरे वनों से आच्छादित खूबसूरत पहाड़ियां भी कंक्रीट के जंगलों में तेजी से तब्दील होने लगी..! गंगा अतिक्रमण की बेड़ियों से मुक्त होकर अविरल करोड़ो लोगों को जीवन देते हुए बहना चाहती थी लेकिन गंगा के इस दर्द को किसी ने नहीं समझा..! ऐसे में भागीरथी क्या करती..?

कई बार छोटी मोटी आपदाओं के जरिए कुदरत ने अपने निजि स्वार्थों के लिए प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे लोगों को संदेश देने की कोशिश भी की लेकिन कुदरत के ये इशारे समझने में इंसान नाकाम रहा या यूं कहें कि किसी ने समझने की कोशिश ही नहीं की..!

नासमझ लोगों को समझाने के लिए कुदरत के पास शायद आखिर में यही एक रास्ता था देवभूमि को विकृत होने से रोकने का…देवभूमि को वापस उसके स्वरूप में लाने का…तो कुदरत ने अपना रास्ता खुद बना लिया..!

इसका ये मतलब कतई नहीं है कि पहाड़ों में विकास कार्य न किए जाएं…वहां के लोग बिजली, पानी और सड़क से महरूम रहें लेकिन प्रकृति से छेड़छाड किए बिना भी तो ये सब संभव है। प्रभावी कार्ययोजना के साथ…निजि स्वार्थों को त्याग कर भी तो पहाड़ों में विकास की गंगा बहायी जा सकती है। इस तरह पहाड़ की खूबसूरती भी बरकरार रहेगी और भागीरथी के प्रवाह को रोकने की भी जरुरत नहीं पड़ेगी लेकिन अफसोस ऐसा होता नहीं है..!

तबाही के इस भयावह मंजर के बाद भी शासन-प्रशसान के साथ ही स्थानीय लोग सबक लें तो भी भविष्य में ऐसी आपदाओं को रोका तो नहीं जा सकता लेकिन इससे होने वाले जान माल के नुकसान को कम जरुर किया जा सकता है। लेकिन सवाल फिर खड़ा होता है कि क्या ऐसा कभी हो पाएगा..?

आखिर में गंगा की हालत और तबाही के इस मंजर पर गंगा पर लिखी गयी ये पंक्तियां याद आ रही हैं।

विस्तार है अपार प्रजा दोनों पार

करे हाहाकार निःशब्द सदा

ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों

नैतिकता नष्ट हुयी, मानवता भ्रष्ट हुयी

निर्लज्ज भाव से बहती हो क्यों

इतिहास की पुकार करे हुंकार

ओ गंगा की धार निर्बल जन को

सबल संग्रामी समग्र गामी बनाती नहीं हो क्यों

ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों

दीपक तिवारी

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