केजरीवाल- छलावा या आम आदमी का संघर्ष..?

राजनीति के दलदल में उतरकर जनता के लिए सत्ता का रास्ता तैयार करने की बात करने वाले आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल लिया है और बकौल आम आदमी पार्टी उन्हें जनता का भरपूर साथ मिल रहा है लेकिन ये साथ वास्तव में दिखाई नहीं दे रहा है। केजरीवाल को लेकर लोगों के मत भी अलग- अलग है और कुछ लोग राजनीति में उतरकर राजनीति की गंदगी को साफ करने के केजरीवाल के फैसले को सही मानते है तो कुछ लोग इसे सिर्फ स्वार्थ की राजनीति करार देते हैं ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या वाकई में केजरीवाल का राजनीति में उतरने का फैसला व्यक्तिगत स्वार्थों को साधने का एक जरिया है या फिर वाकई में केजरीवाल जिस मिशन की बात कर रहे हैं उस पर विश्वास किया जा सकता है..?

अन्ना हजारे से अलग होने के बाद राजनीतिक दल गठन के केजरीवाल के फैसले से कहीं न कहीं लोगों का विश्वास टूटा है और लोगों को भ्रष्ट तंत्र में सुधार की जो गुंजाईश दिखाई देने लगी थी कहीं न कहीं वो धुंधली हुई है और शायद यही वजह है कि जो जनसहयोग केजरीवाल के अन्ना से अलग होने से पहले इस तरह के अनशन में या आंदोलन में दिखाई देता था वो अब कहीं नजर नहीं आता है।

राजनीतिक दलों और राजनेताओं के झूठे वादे और व्यक्तिगत स्वार्थों की राजनीति से कहीं न कहीं लोग इस कदर त्रस्त हैं कि शायद वे अब राजनीति के रास्ते इस गंदगी को साफ करने के केजरीवाल के फैसले को पचा नहीं पा रहे हैं और केजरीवाल एंड कपनी को भी उसी नजर से देखने लगे हैं जिस नजर से वे मौजूदा राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को देखते हैं।

लेकिन केजरीवाल के राजनीतिक दल गठन से पहले की भूमिका और इससे पहले उनके कार्यों को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते ऐसे में ये कहना फिलहाल जल्दबाजी होगा कि अरविंद केजरीवाल भी दूसरे राजनेताओं की तरह व्यक्तिगत स्वार्थ की राजनीति कर रहे हैं और सत्ता में पहुंचकर अपने हित साधना चाहते हैं। जो लोग ऐसे कह रहे हैं अगर वाकई में उनकी बातों में दम है तो इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि केजरीवाल अगर ऐसा कुछ कर रहे हैं तो वो ज्यादा दिन तक जनता को बेवकूफ नहीं बना सकते..!

जहां तक केजरीवाल को अन्ना से अलग होने के बाद पहले जितना जनसमर्थन न मिलने की बात है तो इसके पीछे कहीं न कहीं अन्ना के आंदोलन के बिखरने को हम एक वजह के रूप में देख सकते हैं क्योंकि उस वक्त टीम अन्ना से देश की जनता की उम्मीदें बहुत ज्यादा बढ़ गयी थी जिसका प्रमाण आंदोलन में शामिल होने वाला लोगों का भारी जनसमूह था लेकिन आंदोलन का एकाएक खत्म होना और केजरीवाल का राजनीतिक दल गठन का फैसला करना लोगों की उम्मीदों पर एक कुठाराघात की तरह था जिसका असर अब केजरीवाल के आंदोलन में साफ दिखाई देने लगा है जहां पहले जितना जनसमर्थन नहीं दिखाई देता..!

दरअसल इसके पीछे राजनीति के प्रति लोगों की बन चुकी वो मानसिकता भी है जो लोगों को ये सोचने पर मजबूर करती है कि कोई भी आंदोलन एक राजनीतिक हथकंडा है और लोगों का एक वर्ग कहीं न कहीं ये मानने लगा है कि अरविंद केजरीवाल का आंदोलन भी सिर्फ एक राजनीतिक हंथकंडा है जिसका खामियाजा केजरीवाल के आंदोलन और संघर्ष को भुगतना पड़ रहा है और राजनीतिक दल गठन से पहले केजरीवाल की जो छवि लोगों के जेहन में थी राजनीति शब्द जुड़ने के साथ ही वो छवि भी अब राजनैतिक हो गयी लगती है..!

निश्चित तौर पर राजनीति में उतरने का अधिकार हर व्यक्ति को है और अगर अरविंद ने ऐसा किया है तो इसे हम पूरी तरह गलत नहीं ठहरा सकते हैं। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि राजनीति के दलदल में में खुद को डूबने से बचाना केजरीवाल एंड कंपनी के लिए आसान काम नहीं होगा..?

हो सकता है केजरीवाल खुद को इस दलदल में डूबने से बचा भी लें लेकिन आम आदमी पार्टी से जुड़े उनके आस पास रहने वाले लोग क्या खुद को डूबने से बचा पाएंगे..? जाहिर है अगर उनके आस पास के लोग इस दलदल में डूबते हैं तो उस वक्त सवाल केजरीवाल पर ही उठेंगे और केजरीवाल के लिए इन सवालों का सामना करना आसान नहीं होगा।

अलग – अलग लोगों की दलीलें भी अलग- अलग हैं और हम सिर्फ इन दलीलों के आधार पर ही सरकारी अधिकारी से समाजसेवी और समाजसेवी से राजनेता बने अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी से मुंह नहीं मोड़ सकते कि केजरीवाल का संघर्ष देश की जनता के साथ छलावा है क्योंकि केजरीवाल भी ये बात अच्छी तरह समझते हैं कि अगर उनकी नीयत में अगर खोट है तो वो ज्यादा दिन तक देश की जनता को नहीं छल सकते।

बहरहाल चुनाव में असल तस्वीर पर से पर्दा जनता को ही हटाना है और चुनावी नतीजे ये साफ कर देंगे कि जिस आम आदमी के सहारे अरविंद केजरीवाल भ्रष्टतंत्र को बदलने की लड़ाई लड़ रहे हैं उस आम आदमी के दिल में केजरीवाल जगह बना पाए हैं या नहीं..?

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