समर्पण की प्रतिमूर्ति शहीद सुखदेव थापर

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Sukhdev Thapar

भारत की जन्म भूमि वीर सपूतो की जननी रही है, जहाँ पर गाँधी, नेहरू, सुभाष बोस चन्द्र, भगत सिंह, रानी लक्ष्मी बाई ऐसे अनगिनत वीर सपूत हुए हैं। जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर देश को अंग्रेजो की बेडियो से मुक्त कराया। आज उन्ही की बदौलत हम आजाद भारत में चैन की सांस ले रहे है.गाँधी जयंती, नेहरू जयंती, सुभाष बोस चन्द्र जयंती, भगत सिंह जयंती आदि जयन्तियो से आप वाकिफ होंगे. जिनको हम हर साल याद करते है. लेकिन आजादी दिलाने में छोटे राज्यों का सपूतो का भी बड़ा योगदान रह है. ऐसे ही एक वीर सपूत थे शहीद सुखदेव थापर।

शहीद सुखदेव सौन्दर्य के प्रतिमूर्ति मासूम व्यक्तितत्व, कुशल संगठन कर्ता और अपनत्व के धनी थे.जिनका 15 जन्म 1907 मई को लुधियाना के एक छोटे से गाँव''नौधरा''सभी हुआ था। इनके पिता का नाम रामलाल थापर था. कहा जाता है की बचपन में सुखदेव जिद्दी स्वभाव के थे. बचपन में ही सुखदेव के ऊपर दुःख का साया टूट पड़ा, जब 10 ये साल के थे तब इनके पिता रामलाल थापर का साया इनके सिर से उठ चूका था. ऐसे कठिन परिस्थितियों में इनका पालन - पोषण देश भक्त अर्थात देश के लिए मर मिटने वाले इनके चाचा चितराम और माता रल्लीदेइ ने किया। कई बार सुखदेव के चाचा और माता को जेल जाना पड़ा जिससे सुखदेव में बचपन से ही राष्ट्रप्रेम की भावना जग गई थी जो युवा होने पर और भी सख्त हो चुकी थी. भगत सिंह और सुखदेव समाजवाद के पक्के समर्थक थे. इन्होंने अपने भगत परममित्र सिंह जी, भगवती चन्द्र ओहोरा, कोम्ब्रेड रामचंद्र जी के साथ लाहौर सभी नौजवान सभा का संगठन किया।

इस संगठन के प्रमुख उद्देश्य थे युवाओ के ह्रदय में प्रेम राष्ट्र की ज्योति जगाना और साम्रदायिकता व् स्पर्श्यता का अंत करना व् हिन्दुस्तानी पब्लिकन एसोशिएसन नामक क्रांतिकारी सभा के प्रमुख सदस्य थे. सभी 1928 दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान सभी गठित हिन्दुस्तान सोशालिष्ट रिपब्लिक एसोशियेशन की स्थापना उद्देश्य समाजवाद था. आज प्रत्येक व्यक्ति चाहे किसी अन्य क्रांतिकारी को न जाने किन्तु सुखदेव, भगत सिंह, राजगुरु की त्रिमूर्ति को अवश्य जानता है।इसका कारण व्यवहारिक सोच उन्होंने साबित कर दिया था की क्रांतिकारी कोई सनकी या मुर्ख युवक नहीं होते जो सिर्फ मरने मारने की हिंसा करते है. बल्कि वो तो बहुत सोच विचार कर मूल्यवान प्राणों को अपनी भूमि मात्र के चरणों मे अर्पण कर देते है. राष्ट्री अभिलेखागार सभी 7 दसको तक धुल खाने के बाद लाहौर केश षड़यंत्र का एतिहसिक 2005 निर्णय सभी प्रकाशित किया जोड़ा गया.इससे सुखदेव जी के अतुल्यनी योगदान का पता चलता है। सुखदेव को इस का षड़यंत्र मस्तिष्क कहा जा सकता है।

सुखदेव थापर का अपने साथियों से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी। उन्होंने किसी बात को लेकर अपने साथियों को स्पष्टीकरण दिया और न ही शिकायत की, ऐसे विलक्षण प्रतिभा के थे, सुखदेव थापर।वह राजगुरु और भगत सिंह को अपना रकीब मानते थे. यही कारण था जब भी ये दोनों मिलते थे तो घंटो बाते किया करते थे. इन दोनों साथियों ने अंग्रेजो को नाको चने चबा दिए थे। सुखदेव की स्मरण शक्ति काफी और तीब्र विलक्ष्ण थी. किसी पुस्तक को जल्दी से पढ़कर ख़त्म करने में ये माहिर थे।

जब साइमन 1928 कमीशन सभी लाया जोड़ा गया था तो उसके विरोध सभी लाला लाजपत राय को की मौत हुई थी तो इस बात का बदला लेने के लिए सुखदेव और भगत सिंह ने सांडर्स को गोली मार दी और अपना नाम लाहौर कांड से जोड़ लिया. यही नहीं असेम्बली में अंग्रेजो के खिलाफ आवाज वाला बम भी फेंका।
यह वही सुखदेव थे जिनके और मित्र आदर्शो के प्रति हठ ने आदर्शो के प्रचार के लिए न्यायालय का बेहतर इस्तिमाल करने का लिए भगत सिंह की नाराजगी से लेकर उसे भला - बुरा कहकर असेम्बली बम कांड का दायित्व केन्द्रीय समिति को सौप दिया. इस घटना की दुर्गा भाभी गवाह थी। सूखदेव हिंदुस्तान के समाजिक गणतन्त के सदस्य थे. इस प्रकार सूखदेव थापर ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया ऐसे वीर सपूत अंग्रेजो के खिलाफ लड़ते 1931 हुए सभी भगत सिंह, राजगुरु और सूखदेव हंसी - हंसी फंसी पर लटक कर अपना नाम हमेशा के लिए इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों सभी दर्ज करा दिया।

सभी तथ्य सुखदेव थापर के पोते अनुज थापर से हमारे संवाददाता दिलीप पाठक की बातचीत पर आधारित है।


दिलीप पाठक
इंडिया हल्ला बोल