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"शहीदों के साथ कैसा मजाक "

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tribute martyrs

"शहीदों  की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले "

वतन पर मरनेवालों का यही बाकी निशां होगा। "

गुलाम भारत में शहीदों  के लिए लिखी गयी ये चंद लाइने आज वास्तव में अपनी साथर्कता सिद्ध करती हुई दिखाई देती हैं। अभी दो दिन पहले हमारी संसद पर हुए हमले की बरसी थी हमारे गणमान्य नेताओं ने इस दिन एक बार फिर से इस काले दिन को याद किया और कहा की हमारे शहीद हुए सुरक्षाकर्मियों ने वास्तव में अदम्य सहस का परिचय दिया हम उनके साहस की प्रशंसा करते हैं। मैं कहता हूँ की क्या इतना कह देने भर से उन शहीदों की आत्माओं को सुकून मिल गया होगा ?

उस शर्मनाक आतंकवादी हमले में ऊपर वाले का शुक्रिया अदा कीजिये की हमारे सत्ता के "माननीय "सकुशल बच गए। उस हमले में शहीदों के परिवारों को क्या उचित पारितोषिक मिला? चलिए इसको छोड़ दे तो ,एक बात जो मै कहना चाहता हूँ कि उस आतंकवादी हमले में पकड़ा गया आतंकी अफज़ल गुरु ,जिसको माननीय न्यायालय ने फँसी कि सजा दे दी थी आखिर आज तक जिंदा क्यूँ है? हमारी सरकार  को आखिर उससे इतना प्यार क्यों है?

ये तो हुई एक कहानी, दूसरी कहानी यह है कि जब २६/११ को मुंबई पर आतंकवादी हमला हुआ था जिसमे करीब २०० के करीब लोग मारे गए थे उस मामले का क्या हुआ? इस हमले में दस आतकवादियों ने ७२ घंटे से अधिक हमारे देश कि साँसे रोक कर रखी थीं। हमारे वीर शहीदों ने उनमे से नौ को मार गिराया और एक को पकड़ लिया। पकड़ा गया आतंकी अजमल कसाब जिसको भी कोर्ट ने मौत कि सजा दी थी वो भी आज तक सरकारी दामाद बना बैठा है। आखिर ऐसा क्यूँ ?

चलिए ये तो हमारा दुर्भाग्य ही है क्योंकि इस सवाल से देश के निति नियंता भले ही अविचलित बने रहें ,लेकिन आम देशवासियों का मस्तक शर्म से झुक जाता है। यह एहसास किसी को भी क्षोभ से भर देने के लिए पर्याप्त है कि देश कि अस्मिता को कुचलने कि साजिश में शामिल रहे एक आतंकवादी कि सजा पर सिर्फ इसलिए अमल नहीं हो पता क्योंकि सत्ता में बैठे कुछ लोगों को अपने वोट बैंक पर विपरीत प्रभाव पड़ता नज़र आ रहा है यह निकृष्ट राजनीति ही नहीं बल्कि जवानों के शौर्य और बलिदान का जान बुझ कर किया जाने वाला अपमान भी है। यह आतंकियों के समक्ष घुटने टेकना नहीं ,बल्कि उन्हें प्रोत्साहित करने जैसा भी है।

अफज़ल कि दया याचिका के बारे में लम्बे अरसे तक देश को गुमराह करके अब बहाना बनाया जा रहा है कि मामला राष्ट्रपति के पास है और सविधान  किसी कि दया याचिका पर फैसले के उद्देश्य से राष्ट्रपति के  लिए कोई समयसीमा तय नहीं करता ,इस कुतर्क के सहारे देश को यह समझाने कि कुचेष्टा  हो रही है कि राष्ट्रपति के सामने केंद्रीय सत्ता कितनी असहाय है |यह तो बताने कि जरुरत नहीं कि हमारे देश में राष्टपति को क्या शक्तियां हैं ,लेकिन यह हमारा और आपका दुर्भाग्य है कि हम इस देश में सत्ता चुनते हैं और बाद में वाही सत्ता निरंकुश साबित होती है।

----अभिषेक द्विवेदी -----

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