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शक्ति का मूल है कामाख्या

शक्ति एक ऐसा तत्व है जिसके बिना जीव-जंतु,वनस्पति,मनुष्य, देवी-देवता और संपूर्ण ब्रह्मांड ही निष्क्रिय है ! बिना शक्ति के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है ! स्वयं महादेव शिव भी बिना शक्ति के शव समान ही हैं !

शक्ति का मूल है महा शक्ति पीठ कामाख्या ! कामाख्या का शक्ति मूल बनना भी भगवान शिव व माता शक्ति की ही लीला का हिस्सा है ! भगवान शिव की पत्नी माता सती के पिता प्रजापति दक्ष द्वारा महा यज्ञ करवाया गया परंतु उस यज्ञ में भगवान शिव को ना बुलाकर उनका निरादर किया गया ! माता सती के सम्मुख शिव का अपमान किया गया, जिससे दुखी व क्रोधित हो माता सती ने उसी यज्ञ कुंड में अपने प्राण त्याग दिए !

शिवगणों द्वारा संपूर्ण यज्ञ का विनाश कर दिया गया और परम शिव गण वीरभद्र ने दंडस्वरूप प्रजापति दक्ष का मस्तक काट यज्ञ अग्नि में स्वाहा कर दिया ! शिव ने अपनी प्रिय पत्नी के शरीर को उठाकर भयंकर तांडव करना प्रारंभ कर दिया, उनके तांडव से संपूर्ण ब्रह्मांड कंपित हो उठा ! सभी देवी-देवता भयभीत हो रक्षा हेतु भगवान विष्णु के पास पहुंचे !

भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 टुकडे कर डाले ! पृथ्वी पर 51 भिन्न-भिन्न जगहों पर माता सती के अंग गिरे, जिसके कारण वह सभी स्थल शक्तिपीठ बने ! जहां पर माता का गुप्त अंग (योनि मंडल) गिरा वह बना प्रमुख “शक्तिपीठ कामाख्या” जिस पहाड़ी पर माता का यह अंग गिरा उसे भगवान शिव का ही स्वरूप माना जाता है और गुप्त अंग के वहां गिरते ही वह पूरा पर्वत नीला हो गया ,तभी से उसे नीलांचल पर्वत कहा जाता है ! कामाख्या प्रणाम मंत्र इसी आधार पर है………

कामाख्याये वरदे देवी नीलपावर्ता वासिनी !

त्व देवी जगत माता योनिमुद्रे नमोस्तुते !!

कामाख्या ही कामेश्वरी है अर्थात सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली ! कामाख्या ही महामाया है, जो कि अपनी इच्छा अनुरूप कोई भी स्वरूप ले सकती है !कामाख्या का आकर्षण बहुत ही तीव्र है, इसलिए इसे आकर्षण की देवी भी माना जाता है ! कामाख्या ही काली व महात्रिपुरसुंदरी है !  द्रौपती को कामाख्या का ही स्वरूप माना जाता है ! पांडवों ने भी कामाख्या जाकर माता का पूजन किया था उनके खोए हुए राज्य की पुनः प्राप्ति के लिए !

कामाख्या मंदिर को सबसे रहस्यमयी मंदिर माना जाता है, क्योंकि आज भी प्रतिवर्ष आषाढ़ मास में जब आद्र नक्षत्र लगता है तो माता रजस्वला होती है ! महा योनि भाग होने के कारण माता रजस्वला होती है ! कामाख्या में माता की कोई मूर्ति नहीं है, ना ही यहां कोई दर्शन है ! यहां माता का गुप्त अंग विराजमान है, जिसे सदैव गुप्त ही रखा जाता है ! माता के रजस्वला होने पर इसे लाल रंग के अंग वस्त्र से ढककर मंदिर के कपाट तीन दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं !

इस दौरान कामाख्या में बड़ा उत्सव मनाया जाता है ,जिसे “अंबुवाची” कहा जाता है ! देश-विदेश से साधु-संत, योगी और तंत्र साधक यहां साधना करने के लिए पहुंच जाते हैं ! कामाख्या सर्वोच्च तंत्र पीठ भी है, तो यह काल तंत्र साधकों के लिए अमृत तुल्य होता है ! इस दौरान कामाख्या अपनी पूर्ण ऊर्जा में होती है ! संपूर्ण देवी-देवता कामाख्या में नतमस्तक हो जाते हैं ! इस समय ध्यान साधना शीघ्र फलित होती है, स्वत: ही कुंडलिनी स्पंदन प्रारंभ हो जाता है !

साधकों के सभी मंत्र सिद्ध होने प्रारंभ हो जाते हैं, साधक पूर्ण वर्ष इस समय का इंतजार करते हैं ! मां कामाख्या सभी पर अपनी कृपा वर्षा करती है ! चौथे दिन मंदिर के कपाट खोले जाते हैं, माता का अंगवस्त्र ही प्रसाद स्वरूप में कुछ भाग्यशाली भक्तों को प्राप्त होता है ! इस वस्त्र में गजब की ऊर्जा होती है ! मेरा निजी अनुभव है कि यह वस्त्र सभी इच्छाओं की पूर्ति व कायाकल्प करने की क्षमता रखता है !

इस वर्ष 22 जून से 26 जून तक अंबूवाची पर्व पड़ रहा है ! साधकों को अवश्य इसका लाभ उठाना चाहिए ! कामाख्या पहुंच मां की साधना करें, इस काल की शक्ति साधना आपके जीवन की दशा व दिशा बदल देगी ! आपका जीवन व प्राणशक्ति “शक्ति” से सराबोर हो जाएंगे ! असाध्य कार्य भी साध्य होंगे ! शक्ति के मूल की साधना का यह सौभाग्यशाली अवसर है.

जय मां कामाख्या

श्री शरभेश्वरा नंद “भैरव” जी महाराज के द्वारा लिखा हुआ। 

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