सत्य घटना – सिर कटी आत्मा ने की मुक्ति की गुहार और फिर…

सत्य घटना – सिर कटी आत्मा ने की मुक्ति की गुहार और फिर…

जैसा की हमने आपको अपने पिछले लेख में बताया था की इंडिया हल्लाबोल के पाठकों की डिमांड पर हमने दुनिया की तन्त्र की राजधानी माने जाने वाली पीठ “कामख्या मंदिर” (गुवाहटी, असम) के भैरव पीठ के उत्तराधिकारी श्री शरभेश्वरा नंद “भैरव” जी महाराज से बात कर उनसे तन्त्र के सही स्वरूप को जानने के लिए निवेदन किया था। जिस पर इंडिया हल्ला बोल के पाठकों के लिए उन्होंने पहली बार मीडिया में अपने लेख देने के लिए अपनी सहमति दी है। उसी क्रम में हम आज उनका ये लेख आपके लिए लेकर आये हैं “सत्य घटना – सिर कटी आत्मा ने की मुक्ति की गुहार और फिर…”

श्री शरभेश्वरा नंद “भैरव” जी महाराज से मिलने के लिए आप 09418388884 पर कॉल करके अपनी मीटिंग फिक्स कर सकते हैं। 

सूक्ष्म जगत बहुत ही विशाल है। उसकी विशालता को समझ पाना बहुत ही कठिन कार्य है। स्थूल जगत से कहीं ज्यादा विशालता सूक्ष्म जगत की है और इसी के साथ बहुत सारी अतृप्त आत्माएं सूक्ष्म जगत में भटकती रहती है। आज हम आपको एक ऐसी ही सत्य घटना से अवगत करवाने जा रहे हैं। यह घटना आज से कुछ समय पूर्व की है। एक महिला हमसे मिलने आई और उसने अपने कुछ अनुभव हमें बताएं, महिला के अनुसार पिछले कुछ समय से उसे लगातार ऐसे स्वपन आ रहे थे कि, जैसे वह बिना सिर के जंगलों में भटक रही है व अपना सिर खोज रही है। महिला ने हमें कहा गुरुजी मुझे लगता है कि मुझे अपने पूर्व जन्म के कुछ आभास हो रहें हैं। ऐसा महसूस होता है कि पूर्व जन्म में किसी ने मेरा सिर काट दिया होगा ओर मैं उसे लगातार ढूंढे जा रही हूँ।

हमने जब उस महिला की समस्या को जाना तो हमें समझ में आया कि यह उसके पूर्व जन्म का आभास नहीं था, बल्कि एक ऐसी अतृप्त प्रेत आत्मा थी जो उसे लगातार इस तरह के आभास कराए जा रही थी। हमने उस आत्मा से संपर्क करने की कोशिश की और जब हमारा संपर्क उस आत्मा से हुआ तो हमने पाया कि एक युवा लड़की लगभग कोई 19-20 वर्ष की हमारे समक्ष बिना सर के खड़ी है।

हमने उससे उसके बारे में जब जानना चाहा तो वह मात्र इशारे करती रही। वह इशारों-इशारों में हमें यह बता रही थी कि उसका सर नहीं है और वह बात नहीं कर सकती। अब यह एक बहुत ही विकट स्थिति थी तो हमने इस स्थिति को समझते हुए यह निर्णय लिया कि इस समस्या का समाधान और इस प्रेत आत्मा का उत्थान अगर कहीं हो सकता है तो वह है… मुक्ति क्षेत्र “काशी” तो हमने हमारे पास आई महिला से कहा कि कि हमें काशी जाना होगा और वह भी हमारे पास काशी आए, वही पर हम इस समस्या का समाधान करेंगे।

हमने उस प्रेत आत्मा को अपने वशीभूत किया और दो चार दिन बाद हमारा काशी जाना हुआ। यात्रा के दौरान हम यह महसूस करते रहे कि वह प्रेतात्मा बहुत ही प्रसन्न और उत्सुक है कि उसका कुछ कल्याण होने वाला है, उसे इस पीड़ा और कष्ट से मुक्ति मिलने वाली है। खैर हम काशी पहुंचे, बाबा विश्वनाथ, काल भैरव जी के दर्शन करने के उपरांत रात्रि में हम मणिकर्णिका घाट महा श्मशान भूमि में गए। वहां पर कल्लू बाबा के धूने पर हमने पूजन, यज्ञानुष्ठान किया। तदोपरांत हमने वहां पर हमारे परिचित से संपर्क किया जो कि मणिकर्णिका घाट पर चंडाल का कार्य करता है, उसे कहा कि हमें कल पूजा के लिए एक स्त्री मुंड की आवश्यकता है। उसने हमें बताया कि यहीं साथ में एक अघोरी बाबा रहता है ओर उसके पास एक स्त्री का मुंड पड़ा है, जिस पर वह अपनी साधनाएं कर रहा है, लेकिन वह यह मुंड किसी को नहीं देगा। हमने उसे कहा कि हमें अघोरी बाबा से मिलाइए। जब हम अघोरी के पास पहुंचे तो वह शराब के नशे में धुत पड़ा था। हमने उसे उठाया और उसे कहा कि हमें कुछ समय के लिए आपका यह साधना में रखा मुंड चाहिए और पूजन उपरांत हम आपको यह वापिस कर देंगे। अघोरी ने इस बात के लिए साफ मना कर दिया तो हमें उसे समझाने में और उसे सहमत करवाने में कई घंटों की मेहनत करनी पड़ी, अंततः उसने इस बात पर स्वीकृति दे दी कि सारा पूजन उसके सामने ही हो और उसे कुछ धन राशि भी दी जाए तो ही वह यह मुंड पूजन के लिए दे सकता है। हमने उसकी सारी शर्तें मानी और अगला दिन पूजन के लिए तय किया।

अगले दिन रात्रि में उस महिला और उसके पति के साथ हम मणिकर्णिका घाट पर गए और अघोरी के पास पहुंचे। अघोरी अपनी कुछ पूजा वहां पर कर रहा था तो हमें थोड़ी प्रतीक्षा करनी पड़ी, जैसे ही उसकी पूजा समाप्त हुई उसने मुस्कुराते हुए हमें इशारा किया कि हम जो पूजन करना चाहते हैं, कर सकते हैं। हमने उसे एक बोतल मदिरा की अर्पित की जिसे ले वह प्रसन्न हो गया।

अब हमने पूजन शुरू किया, यह पूजन अघोर पूजन श्रेणी में आता है, तो पूजन शुरू करने के कुछ समय उपरांत प्रेतात्मा को हमने बंधन मुक्त कर उपस्थित किया, उसे सामने बिठा उस पर कुछ पूजन करने के उपरांत हमने वह स्त्री मुंड उसे प्रदान किया। उस की स्थापना उसके धड़ पर की। मुंड की प्राप्ति होने के उपरांत वह खुशी से झूम उठी और बार-बार अपना सिर हिलाती रही जैसे कि वह यह भरोसा करना चाह रही हो कि उसे वास्तव में मुंड की प्राप्ति हुई भी है या नहीं?

मुंड में उसकी चेतना की पूर्ण स्थापना करने के उपरांत हमने उससे संवाद प्रारंभ किया… तो उसने जो हमें अपने बारे में बताया उसके अनुसार वह बंगाल क्षेत्र की रहने वाली थी। उन दिनों उसके क्षेत्र में भारतवर्ष के आजाद होने की चर्चा बड़े जोरों पर थी। वह एक गरीब परिवार से संबंध रखती थी। शायद वह स्वतंत्रता प्राप्ति से कुछ वर्ष पूर्व की घटना बता रही होगी, उसने बताया कि उसका प्रेम उसके गांव के एक बहुत ही संपन्न व्यक्ति के पुत्र के साथ था और उसके प्रेमी के पिता ने इसी कारण उसकी हत्या करवा दी। उसकी गर्दन काट कर उसके धड़ को उसके पिता के घर के बाहर फेंक दिया और उसका सर कहीं दूर जिसका ज्ञान उसे नहीं है फेंक दिया। वह तभी से बिना सर के प्रेत योनि को प्राप्त हो गई ओर इसी पीड़ा में इतने वर्षो से भटकती रही।

हमें उस उस प्रेत आत्मा का दुख: जानकर बहुत दुख: हुआ। हमने उससे पूछा कि, वह इस महिला को क्यूं पीड़ित कर रही थी? तो उसने बताया कि यह तो एक संयोग मात्र है। एक दिन उसने इस महिला को पीपल के पेड़ के नीचे बहुत अच्छे से पूजा करते हुए देखा तो इसने सोचा कि इतनी पूजा-पाठ करने वाली महिला को अगर यह किसी तरह पीड़ा पहुंचाए तो यह अपना समाधान अवश्य करवाएगी।  शायद कोई इसकी समस्या के मूल में जाकर मुझ तक पहुंच पाए और मेरी समस्या का भी समाधान करे। अब यह संयोग मात्र समझिये या प्रभु इच्छा, इस सभी घटनाक्रम में हम भी साथ में जुड़ गए और हमने इसका समाधान मुक्ति क्षेत्र काशी में करने का निर्णय लिया। अब क्योंकि उस प्रेत आत्मा को उसके सर की प्राप्ति हो चुकी थी ओर वह प्रसन्न थी, तो हमने उसे समझाया कि अब हम तुम्हारी मुक्ति का उपाय करते हैं, तुम आगे जन्म लो। वह बहुत शांत बैठी रही और जैसे वह मन ही मन अपने किसी ईष्ट से प्रार्थना कर रही हो। हमने उसे प्यार से समझाया कि प्रेत योनि तो सिर्फ पीड़ादायक योनि है, तुम्हारा सौभाग्य होगा कि तुम्हें काशी में मुक्ति प्रदान होगी। वह हमारी बात से सहमत हो गई।

अब हमने उसका एक पुतला बनाया और उसमें उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर विशेष विधान से उसका पूजन कर मणिकर्णिका घाट पर ही एक चिता में उसका अंतिम संस्कार किया और उसका विसर्जन गंगा जी में कर दिया। उसके उपरांत हमने देखा कि वह बहुत ही दिव्य और सुंदर कन्या के रूप में परिवर्तित हो वहां से प्रसन्नता पूर्वक हमें देखती हुई विलुप्त हो गई, हमें भी बहुत आत्मिक शांति हुई। किसी पीड़ा में पड़ी प्रेतात्मा, जो कि वास्तव में बहुत दुखी है, के लिए कुछ करके बहुत संतुष्टि प्राप्त होती है।

हमारे साथ आई महिला भी बहुत ही शांत और प्रसन्न भाव में थी। उस दिन से लेकर आज तक दुबारा उसे इस तरह के स्वपन कभी नहीं हुए, हां यह जरूर हुआ कि उस दिन के बाद उसके पति का काम इतना ज्यादा बढ़ गया कि आज वह हर तरह की सुख सुविधा से संपन्न है और इसका कारण वह उस कन्या के आशीर्वाद को मानती है।

यहाँ हम एक बात बताना चाहेंगे की आमतौर पर आप सभी ने देखा होगा की बहुत ज्यादा पूजा-पाठ करने वालों के साथ कुछ आत्माएं या प्रेत-आत्माएं संपर्क में आ जाती है। इसका मतलब यही नहीं होता है की वो आपको परेशान करने आये, इसका एक पहलु यह भी है की वह आपके द्वारा अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढ रही हो। यदि आप उसकी मुक्ति के मार्ग के कारण बनते है, तो आपको सूक्ष्म जगत की बहुत सारी कृपा प्राप्त होती है। इसलिए कभी भी ऐसे समय में ना खबराये।   

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