Oops! It appears that you have disabled your Javascript. In order for you to see this page as it is meant to appear, we ask that you please re-enable your Javascript!

Sikhism History – सिख धर्म का इतिहास

विशेष रुचि न उत्पन्न होने पर वे अपने परिवार को ससुराल में छोड़कर स्वयं भ्रमण, सत्संग और उपदेश आदि में लग गये। इस दौरान वे पंजाब, मक्का, मदीना, काबुल, सिंहल, कामरूप, पुरी, दिल्ली, कश्मीर, काशी, हरिद्वार आदि की यात्रा पर गये। इन यात्राओं में उनके दो शिष्य सदैव उनके साथ रहे- एक था- ‘मर्दाना’, जो भजन गाते समय रबाब बजाता था और दूसरा ‘बालाबंधुं’।

अन्य महान संतों के समान ही गुरु नानक के साथ भी अनेक चमत्कारिक एवं दिव्य घटनाएं जुड़ी हुई हैं। वास्तव में ये घटनाएँ नानक के रूढ़ियों व अंधविश्वासों के प्रति विरोधी दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। नानक अपनी यात्राओं के दौरान दीन-दुखियों की पीड़ाओं एवं समस्याओं को दूर करने का प्रयास करते थे। वे सभी धर्मों तथा जातियों के लोगों के साथ समान रूप से प्रेम, नम्रता और सद्भाव का व्यवहार करते थे। हिन्दू-मुसलमान एकता के वे पक्के समर्थक थे। अपने प्रिय शिष्य लहणा की क्षमताओं को पहचान कर उन्होंने उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और उसे ‘अंगद’ नाम दिया। गुरु अंगद ने नानक देव की वाणियों को संग्रहीत करके गुरुमुखी लिपि में बद्ध कराया। इसी के पश्चात् 1539 में गुरु नानक देव की मृत्यु हो गई।

भाई मरदाना-

संपूर्ण सिक्ख परंपरा में भाई मरदाना का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे जाति से मिरासी मुसलमान थे और गुरु नानक देव के बचपन के मित्र थे। भाई मरदाना बहुत कुशल रबाब वादक थे। वे सारा जीवन गुरु नानक देव के साथ रहे। गुरु नानक देव की 20 वर्ष की देश-विदेश की यात्रा में भाई मरदाना उनके साथ रहे। गुरु नानक देव जो भी वाणी रचते थे, भाई मरदाना उनके साथ रहे। गुरु नानक देव जो भी वाणी रचते थे, भाई मरदाना उसे संगीतबद्ध करते थे। अंतिम समय में भी वे गुरु नानक देव के साथ रहें गुरुग्रंथ साहब में भाई मरदाना रचित तीन श्लोक संग्रहीत हैं।

गुरु गोविन्द सिंह की इच्छा –

सिक्ख धर्म में कृपाण धारण करने का आदेश आत्मरक्षा के लिए है। गुरु गोविन्द सिंह चाहते थे कि सिक्खों में संतों वाले गुण भी हों और सिपाहियों वाली भावना भी। इस कारण कृपाण सिक्खों का एक धार्मिक चिह्न बन गया है। गुरु गोविंद ने पुरुष खालसाओं को ‘सिंह’ की तथा महिलाओं को ‘कौर’ की उपाधि दी।

निरंकार-

सिखमत की शुरुआत ही “एक” से होती है। सिखों के धर्म ग्रंथ में “एक” की ही व्याख्या हैं। एक को निरंकार, पारब्रह्म आदिक गुणवाचक नामों से जाना जाता हैं। निरंकार का स्वरूप श्री गुरुग्रंथ साहिब के शुरुआत में बताया है जिसको आम भाषा में ‘मूल मन्त्र’ कहते हैं।

ओंकार, सतिनाम, करतापुरख, निर्भाओ, निरवैर, अकालमूर्त, अजूनी, स्वैभंग

इस की प्राप्ति ज्ञान द्वारा होती है, इस लिए “गुर परसाद” पर मूल मन्त्र समाप्त होता है।

तकरीबन सभी धर्म इसी “एक” की आराधना करते हैं, लेकिन “एक” की विभिन्न अवस्थाओं का ज़िक्र व व्याख्या श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में दी गई है वो अपने आप में निराली है।

जीव आत्मा-

जीव आत्मा जो निराकार है, उस के पास निरंकार के सिर्फ ४ ही गुण व्याप्त है

औंकार, सतिनाम, करता पुरख, स्वैभंग

बाकी चार गुण प्राप्त करते ही जीव आत्मा वापिस निरंकार में समां जाती है, लेकिन उसको प्राप्त करने के लिए जीव आत्मा को खुद को

Check Also

Five Sikh Symbols – सिख धर्म के पांच चिन्ह

सिख शब्द का शाब्दिक अर्थ शिष्य है। श्री गुरु नानक देव जी से लेकर श्री …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *