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Sikhism History – सिख धर्म का इतिहास

सिख गुरुओं के प्रेरणा-बीज ही हैं। इन लोकगीतों एवं लोक नृत्यों की जड़ें पंजाब की धरती से फूटती हैं और लोगों में थिरकन पैदा करती हैं। भांगड़ा और गिद्धा पंजाब की सांस्कृतिक शान हैं, जिसकी धड़कन देश-विदेश में प्राय: सुनी जाती है।

पंजाबी संस्कृति राष्ट्रीयता का मेरुदण्ड है। इसके प्राण में एकत्व है, इसके रक्त में सहानुभूति, सहयोग, करुणा और मानव-प्रेम है। पंजाबी संस्कृति आदमी से जोड़ती है और उसकी पहचान बनाती है। विश्व के किसी कोने में घूमता-फिरता पंजाबी स्वयं में से एक लघु पंजाब का प्रतिरूप है। प्रत्येक सिख की अपनी स्वतंत्र चेतना है, जो जीवन-संबंधी समस्याओं को अपने ही प्रकाश में सुलझाने के उद्देश्य से गम्भीर रूप से विचार करती आई है। सिख गुरुओं का इतिहास उठाकर देख लीजिए, उन्होंने साम्राज्यवादी अवधारणा कतई नहीं बनाई, उल्टे सांस्कृति,क धार्मिक एवं आध्यात्मिक सामंजस्य के माध्यम से मानवतावादी संसार की दृष्टि ही करते रहे। आज़ादी के पूर्व, भारत-पाक विभाजन एवं इसके बाद कई दशकों में पंजाब में समय-समय पर आए हिंसात्मक-ज़लज़लों एवं निर्दयी विध्वंसों के बावजूद इस धरती के लोगों ने अपना शान्तिपूर्ण अस्तित्व बनाए रखा है। कौंध इनका मार्गदर्शन करती रही है।

सिक्खो के दस गुरू-

सिक्ख धर्म में गुरु परम्परा का विशेष महत्त्व रहा है। इसमें दस गुरु माने गये हैं, जिनके नाम व काल इस प्रकार है-

1.गुरु नानकदेव – (1469-1539 ई.)

2.गुरु अंगद – (1539-1552 )

3.गुरु अमरदास – (1552-1574 )

4.गुरु रामदास – (1574-1581 )

5.गुरु अर्जुन देव – (1581-1606 )

6.गुरु हरगोविंद सिंह – (1606-1644 )

7.गुरु हरराय – (1644-1661 )

8.गुरु हर किशन सिंह – (1661-1664 )

9.गुरु तेगबहादुर सिंह – (1664-1675 )

10.गुरु गोविन्द सिंह – (1675-1608 )

तीसरे गुरु अमरदास ने जाति प्रथा एवं छूआछूत को समाप्त करने के उद्देश्य से ‘लंगर’ परम्परा की नींव डाली। चौथे गुरु रामदास ने ‘अमृत सरोवर’ (अब अमृतसर) नामक एक नये नगर की नींव रखी। अमृतसर में ही पाँचवें गुरु अर्जुन देव ने ‘हरमंदिर साहब’ (स्वर्ण मंदिर) की स्थापना की। उन्होंने ही अपने पिछले गुरुओं तथा उनके समकालीन हिन्दू, मुस्लिम संतों के पदों एवं भजनों का संग्रह कर ‘आदिग्रंथ’ बनाया।

गुरु नानक-

नानक देव का जन्म 1469 ई. में लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान) के समीप ‘तलवण्डी’ नामक स्थान में हुआ था। इनके पिता का नाम कालूचंद और माता का तृप्ता था। बचपन से ही प्रतिभा के धनी नानक को एकांतवास, चिन्तन एवं सत्संग में विशेष रुचि थी। सुलक्खिनी देवी से विवाह के पश्चात् श्रीचंद और लखमीचंद नामक इनके दो पुत्र हुए। परन्तु सांसारिक गतिविधियों में

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