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जानें अर्जुन के अतिरिक्त गीता का उपदेश किसने सुना

भगवद्‍गीता के पठन-पाठन, श्रवण एवं मनन-चिंतन से जीवन में श्रेष्ठता के भाव आते हैं। गीता भगवान की श्वास और भक्तों का विश्वास है। गीता ज्ञान का अद्भुत भंडार है। गीता आत्मा एवं परमात्मा के स्वरूप को व्यक्त करती है। श्री कृष्ण के उपदेशों को प्राप्त कर अर्जुन उस परम ज्ञान की प्राप्ति करते हैं जो उनकी समस्त शंकाओं को दूर कर उन्हें कर्म की ओर प्रवृत करने में सहायक होती है। गीता के विचारों से मनुष्य को उचित बोध कि प्राप्ति होती है, यह आत्मतत्व का निर्धारण करता है, उसकी प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने मानव कल्याण के लिए उन समस्त ज्ञान-विज्ञान विषयक विधिक शास्त्रों के सार रूप ‘गीता ग्रंथ’ को हमारे लिए उपलब्ध करवा दिया।

‘श्रीमद् भगवद् गीता’ समस्त वेदोपनिषदों का सार रूप है। इसकी अनंत महिमा है। यह वह ब्रह्मविद्या है जिसे जान लेने के बाद मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से सर्वथा मुक्त हो जाता है।

गीता का उपदेश है- करुणा को अपनाओ, असत्य का आश्रय न लो, सत्य-पथ को अपनाओ, पवित्रता से रहो, आहार-विहार को शुद्ध करो, सभी प्राणियों की सेवा करो, किसी भी प्राणी के साथ मन, वाणी और शरीर से किसी भी प्रकार का वैर न रखो, सबके साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार करो, द्वेष भाव को त्याग कर सबके कल्याण में रमे रहो, माता-पिता गुरुजनों की सेवा करो और काम को त्यागकर सबके कल्याण में रमे रहो, क्रोध, लोभ तथा मोह को पास मत फटकने दो।

जिस प्रकार युद्धभूमि में मोहग्रस्त अर्जुन को श्री गीता जी का ज्ञान सुनाया और उसे कर्तव्य बोध कराया कि अगर तुम क्षत्रिय होकर इस धर्मयुक्त तथा स्वधर्मरूपी युद्ध को नहीं करोगे जिनकी दृष्टि में तुम पहले सम्मानित थे, वे महारथी तुझे भय के कारण हटा हुआ मानेंगे और तुम्हारे सामर्थ्य की निंदा करते हुए बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे। माननीय पुरुषों के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़ कर है। तब भगवान ने आत्मा के अजर-अमर होने का

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